शनिवार, नवंबर 24, 2007

पाक में चैनल के कार्यक्रम सड़क पर

दो शब्‍द

पता नहीं जनरल साहब किस प्रकार का लोकतंत्र पाकिस्‍तान में चाहते हैं... लगता है उनकी शासन करने की मानसिकता सैन्‍य संचालन की तरह ही जिंदा है। लेकिन जनरल साहब को समझना होगा की यह सेना संचालन जैसा नहीं है। यहां अलग-अलग ख्‍याल के लोग है, जाहिर है अनुशासन का तरीका भी अलग होगा। समझिए जनरल साहब नहीं तो पाकिस्‍तान की जनता शायद समझा दे।

अब खबर
पाकिस्तान की मीडिया ने राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ द्वारा आपातकाल के दौरान लगाए गए प्रतिबंधों के खिलाफ संघर्ष करने का नया तरीका ढूंढ निकाला है।

आपातकाल के दौरान निजी समाचार चैनलों के प्रसारण पर रोक लगा दी गई है, ऐसे में पत्रकारों ने अपनी आवाज जनता तक पहुंचाने के लिए नए उपाय निकाले हैं।

पत्रकारों जिन कार्यक्रमों का प्रसारण पहले स्टूडियों में बैठ कर करते थे, अब उन्होंने ऐसे कार्यक्रम सड़क, चौपालों में करने शुरू कर दिए हैं।

डॉन न्यूज के सम्पादक जफर अब्बास कहते है कि प्रतिबंध लगाए जाने के बाद अब वे अपनी आवाज जनता तक पहुंचाने के लिए सड़कों पर आ गए हैं। पाकिस्तान प्रेस क्‍लब के बाहर ऐसे ही कार्यक्रमों का आयोजन किया जा रहा है जिनमें दर्शक सीधे तौर पर पहुंच रहे हैं।

ऐसा ही एक शो जियो टीवी के प्रस्तोता हामिद मीर द्वारा किया गया जिसमें पूर्व क्रिकेटर और राजनीतिक इमरान खान ने भाग लिया। इस कार्यक्रम में जनता ने बड़े उत्साह से भाग लिया और खान से सवाल पूछे।

जियो, एआरवाई दुबई से अपलिंकिंग सुविधा हटाएंगे

पाकिस्तानी सैन्य शासन के दबाव में प्रसारण पर प्रतिबंध झेल रहे एआरवाई तथा जिओ टीवी चैनल सैटेलाइट सिग्नल अपलिंकिंग सुविधा दुबई की मीडिया सिटी से हटा कर लंदन या सिंगापुर स्थानांतरित करने पर विचार कर रहे हैं।

एआरवाई के मुख्य कार्यकारी अधिकारी सलमान इकबाल ने बताया कि पिछले 22 दिनों में उन्हें 80 लाख डालर का नुकसान उठाना पड़ा है। उन्हें डर है कि ऐसा दोबारा हो सकता है।

दुबई मीडिया सिटी ने दो लोकप्रिय पाकिस्तानी चैनलों का प्रसारण पाकिस्तान सरकार के कहने पर बंद कर दिया था। मीडिया सिटी के अधिकारियों ने कहा कि यह निर्णय संयुक्त अरब अमीरात की तटस्थता और हस्तक्षेप नहीं करने की नीति के अंतर्गत लिया गया।

जिओ न्यूज के अधिकारियों ने बताया कि वे भी प्रसारण अपलिंकिंग सुविधा दुबई के बाहर ले जाने पर विचार कर रहे हैं।

शुक्रवार, नवंबर 02, 2007

बंद से नहीं ठोस निर्णय से बदलेगा बिहार

दो शब्‍द
गुंडा, मवाली और बलात्‍कारी आपके जनप्रतिनिधि हैं तो आप एक बार सोचिए। हो सकता है आपका यह जनप्रतिनिधि आपका ही शिकार कर बैठे। अपराध के विरोध में बंद करने भर से समस्‍या का समाधान नहीं हो सकता। जरूरत है एक बदलाव की और यह बदलाव जनता ही ला सकती है। अपना जनप्रतिनिधि चुनने से पहले यह जरूर देखा जाना चाहिए कि उम्‍मीदवार का बैकग्राउंड कैसा है।

अब खबर

विपक्षी दलों ने पत्रकारों पर हुए जानलेवा हमले के खिलाफ शुक्रवार को बिहार बन्द का आह्वान किया है। बंद से रेलवे, विमान सेवा, एम्बुलेंस, अस्पताल, दवा दुकान सहित आपात सेवाओं को अलग रखा गया है। बन्द को राजद, कांग्रेस, लोजपा, माकपा, भाकपा, एनसीपी, बसपा व समता पार्टी का समर्थन है।
नेता प्रतिपक्ष राबड़ी देवी के नेतृत्व में गुरुवार को विपक्षी दलों के नेताओं ने राज्यपाल आरएस गवई से मिलकर घायल पत्रकारों की सुरक्षा, उनका सरकारी खर्चे पर इलाज व रेशमा खातून की हत्या से सम्बन्धित साक्ष्य मिटाने से सरकार को रोकने का आदेश देने का अनुरोध किया। नेता प्रतिपक्ष राबड़ी देवी ने अभिभावकों से अनुरोध किया है कि वे बन्द के दिन अपने बच्चों को स्कूल, कालेज नहीं भेजें। उन्होंने कहा कि एनडीटीवी के पत्रकार प्रकाश सिंह, फोटोग्राफर हबीब व एएनआई के अजय कुमार की जदयू विधायक अनन्त सिंह ने अपने सरकारी आवास पर जान से मारने की नीयत से बेरहमी से पिटाई की। उन्होंने कहा कि रेशमा खातून नामक महिला की हत्या के सम्बन्ध में पत्रकार उनका पक्ष लेने पहुंचे थे। इससे पूर्व बिहार बन्द को लेकर नेता प्रतिपक्ष के कक्ष में विरोधी दलों के नेताओं की बैठक हुई। इसमें लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ पर हमले को खतरनाक संकेत माना गया।
राज्यपाल से मिलने के बाद नेता प्रतिपक्ष ने कहा कि शिष्टमंडल ने राज्यपाल से रेशमा खातून मामले में विधायक अनन्त सिंह के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज कर स्पीडी ट्रायल चलाने, पुलिस अधिकारियों को बुलाकर साक्ष्य समाप्त होने से बचाने व इसकी जांच कराने का अनुरोध किया गया। उन्होंने कहा कि रेशमा के पत्र पर डीपीजी के स्तर से कोई कार्रवाई क्यों नहीं की गयी। रेशमा ने मुख्यमंत्री को भेजे पत्र में विधायक अनन्त सिंह पर बलात्कार का आरोप लगाया था। उसने अपनी हत्या की भी आशंका जतायी थी। इस पत्र की प्रति नेता प्रतिपक्ष को भी भेजी गयी थी। पत्र की प्रति नेता प्रतिपक्ष ने 27 अक्टूबर को डीजीपी को भेजी भी, लेकिन इसके बावजूद कोई कर्रवाई नहीं हुई।
प्रदेश राजद अध्यक्ष अब्दुलबारी सिद्दीकी व मुख्य प्रवक्ता शकील अहमद खां ने कहा कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार जनता दरबार का नाटक करते हैं जबकि रेशमा के पत्र पर कार्रवाई करने की उनको फुर्सत तक नहीं थी। उन्होंने कहा कि मामले की सीबीआई जांच तभी सार्थक हो सकती है जब साक्ष्य बरकरार रहें। राज्यपाल से मिलने वाले शिष्टमंडल में कांग्रेस विधायक दल के नेता डा. अशोक कुमार, लोजपा के दुलारचन्द यादव, माकपा के सुबोध राय, भाकपा के यूएन मिश्र, बसपा के रामचन्द्र यादव, समता के पीके सिन्हा, प्रदेश राजद अध्यक्ष अब्दुलबारी सिद्दीकी, शकील अहमद खां, रामचन्द्र पूर्वे व रामबचन राय शामिल थे।

गुरुवार, नवंबर 01, 2007

यह कैसा सुशासन है नीतीश जी

दो शब्‍द:

यह कैसा सुशासन है जहां पत्रकारों को बंधक बनाकर रखा जाता है और उसकी पिटाई की जाती है। माननीय मुख्‍यमंत्री जी आपने तो बिहार की जनता के सामने सुशासन लाने का वादा किया था। क्‍या यही आपका सुशासन है। शर्म कीजिए, अगर ईमानदारी से शासन करने के लिए ऐसे अपराधी लोगों का सहयोग लेना पर रहा है तो इससे अच्‍छा है आप अपने पद से इस्‍तीफा दे दें और जनता के दरबार में जाएं। अगर ऐसा नहीं करते हैं तो पिछली सरकार जिसके विषय में आप पानी पी पीकर कोसते रहे, तो उसमें और आपमें कोई अंतर नहीं रह जाएगा।

अब खबर:
बिहार की राजधानी पटना में सत्तारूढ़ जनतादल (यूनाइडेट) के एक विधायक अनंत सिंह के घर पर कुछ पत्रकारों की पिटाई की गई है। पहले उनके घर पर ख़बर लेने गए एक टीवी चैनल एनडीटीवी के पत्रकार और उनके कैमरामैन के साथ गालीगलौज की गई और उन्हें बुरी तरह पीटा गया और फिर उनके घर के सामने जमा हुए पत्रकारों को भी दौड़ा-दौड़ाकर पीटा गया.
इस मारपीट में घायल तीन पत्रकारों को अस्पताल में भर्ती किया गया है. एनडीटीवी के कैमरामैन की हालत गंभीर बताई गई है.
मोकामा के बाहुबली विधायक अनंत सिंह पर कई आपराधिक मामले दर्ज हैं और वे मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के क़रीबी लोगों में से एक माने जाते हैं । वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक कुंदन कृष्णन ने बताया कि विधायक अनंत सिंह और उनके चार समर्थकों को न्यायिक हिरासत में लिया गया है। उधर विपक्ष की नेता राबड़ी देवी ने इस घटना की निंदा करते हुए शुक्रवार को बिहार बंद का ऐलान किया है. मामला एक लड़की के दैहिक शोषण और उसकी कथित हत्या से जुड़ा हुआ बताया जा रहा है.

मामला
पिछले दिनों एक युवती रेशमा ने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और विपक्ष की नेता राबड़ी देवी सहित कई राजनीतिज्ञों को पत्र लिखकर विधायक अनंत सिंह और दो ठेकेदारों पर नौकरी देने के नाम पर दैहिक शोषण का आरोप लगाया था. रेशमा ने अपने पत्र में ठेकेदारों के नाम विपिन सिन्हा और मुकेश सिंह लिखे हैं. पटना के शास्त्री नगर इलाक़े में बुधवार की शाम एक बोर में एक युवती की लाश मिली. इसके बाद यह कयास लगाए जाने लगे कि यह लाश उसी युवती रेशमा की है। हालांकि पुलिस ने इसकी पुष्टि नहीं की है कि यह लाश रेशमा की ही थी. गुरुवार को एनडीटीवी के पत्रकार प्रकाश सिंह अपने कैमरामैन हबीब अली के साथ अनंत सिंह के घर उनका पक्ष जानने के लिए गए हुए थे.
प्रकाश सिंह का कहना है कि उन्होंने जैसे ही इस लड़की के सिलसिले में सवाल पूछे अनंत सिंह नाराज़ हो गए और गालीगलौज करने लगे और फिर मारपीट पर उतर आए. उनका आरोप है कि विधायक के घर पर उन्हें बंधक भी बना लिया गया था. इस घटना की ख़बर मिलने के बाद जब पटना के दूसरे पत्रकार अनंत सिंह के घर के सामने इकट्ठा हुए पत्रकारों को भी अनंत सिंह के समर्थकों और उनके बंगले पर तैनात सुरक्षाकर्मियों ने दौड़ा-दौड़ाकर पीटा। पत्रकार प्रकाश सिंह, कैमरामैन हबीब अली की ओर से पुलिस में अनंत सिंह और उनके समर्थकों के ख़िलाफ़ मारपीट करने, गालीगलौज करने और जान से मारने की धमकी देने की रिपोर्ट लिखाई है. इसके आधार पर वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक कुंदन कृष्णन ने अनंत सिंह के घर जाकर कार्रवाई की है. उन्होंने बताया कि अनंत सिंह और उनके चार समर्थकों को पहचान के आधार पर न्यायिक हिरासत में लिया गया है.
नीतीश कुमार की ओर से इस पर कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है.

शुक्रवार, अक्तूबर 26, 2007

गुजरातः दंगों की ख़बर में फिर लगी आग

दो शब्‍द

गुजरात में दंगा को लेकर काफी विचार मंथन हो चुका है। अभी जो रिपोर्ट आई है वह कोई नई बात नहीं है। सभी जानते हैं कि भाजपा की सरकार दंगाईयों को खुली छूट दिए हुए थी। कत्‍लेआम होते रहा और सरकार चुपचाप बैठी रही। मीडिया की खबरों से सरकार की निंद खुली और राज्‍य में सेना की मदद ली गई। शायद यही राजधर्म था जिसका आह्वान तत्‍कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने किया था।

अब खबर

भारतीय मीडिया जगत के दो समूहों ने गुरुवार की शाम अपनी एक विशेष रिपोर्ट में खुलासा करते हुए दिखाया था कि गुजरात दंगों में जिन लोगों की कथित रूप से भूमिका थी उनका दंगों के बारे में क्या कहना है.

इस सनसनीखेज खुलासे में कुछ सरकार में शामिल नेता, हिंदुवादी संगठनों से जुड़े पदाधिकारियों और यहाँ तक कि पुलिस महकमे के एक आला अधिकारी के बारे में कथित तौर पर बताया गया है कि किस तरह दंगों में अल्पसंख्यकों को मारा गया और प्रशासन की मदद से दंगों की योजना को अमलीजामा पहनाया गया.
संभव है कि इस खुलासे से सामाजिक और सांप्रदायिक स्तर पर ध्रुवीकरण बढ़ेगा और इसका लाभ कट्टरवादी ताकतों को होगा. ज़ाहिर है कि हिंदू हितों की बात करने वाली भारतीय जनता पार्टी और राज्य के नेतृत्वकर्ता नरेंद्र मोदी को इसका लाभ मिलेगा

एक भाजपा विधायक ने कथित रूप से बताया कि दंगों के दौरान मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था कि तीन दिन के वक्त में जो करना हो कर लो. इसके बाद तेज़ी से अल्पसंख्यकों को मारने का काम किया गया था.
ग़ौरतलब है कि 27 फरवरी, 2007 को गोधरा में साबरमती एक्सप्रेस के दो डिब्बों में आग लगने की घटना के बाद गुजरात भर में दंगे भड़क गए थे। साबरमती एक्सप्रेस के जिन दो डिब्बों में आग लगी थी उनमें अयोध्या से लौट रहे हिंदू संप्रदाय के लोग सवार थे। इस घटना में पाँच दर्जन से ज़्यादा लोगों की मौत हो गई थी। इस घटना के बाद ही गोधरा सहित गुजरात के कई हिस्सों में दंगे भड़क गए थे और मुसलमानों के ख़िलाफ़ बड़े पैमाने पर क़त्लेआम शुरू हो गया था। दंगों में महिलाओं, बच्चों सहित सैकड़ों अल्पसंख्यक मारे गए थे।

इस ख़ुलासे में एक महत्वपूर्ण बात यह है कि पहली बार राज्य सरकार और कट्टर हिंदुवादी संगठनों के नेताओं को दंगों की कहानी बयाँ करते हुए दिखाया गया है। माना जा रहा है कि इससे नरेंद्र मोदी को नुकसान कम और फ़ायदा ज़्यादा होगा पर राज्य में हाल ही में विधानसभा चुनाव होने हैं और ऐसे में गुजरात दंगों पर इस विशेष रिपोर्ट के सामने आने के बाद कई तरह के सवाल भी खड़े हो रहे हैं।
मसलन, क्या यह गुजरात दंगों के बारे में की गई खोजबीन को सार्वजनिक करने का सही वक्त था और क्या इससे नरेंद्र मोदी औऱ उनकी पार्टी को कोई नुकसान पहुँच पाएगा। गुजरात के पिछले विधानसभा चुनाव को ध्यान में रखें तो लगता है कि इस ताज़े ऑपरेशन का नरेंद्र मोदी और भाजपा को नुकसान कम और फ़ायदा ज़्यादा मिलेगा। संभव है कि इस खुलासे से सामाजिक और सांप्रदायिक स्तर पर ध्रुवीकरण बढ़ेगा और इसका लाभ कट्टरवादी ताकतों को होगा। ज़ाहिर है कि हिंदू हितों की बात करने वाली भारतीय जनता पार्टी और राज्य के नेतृत्वकर्ता नरेंद्र मोदी को इसका लाभ मिलेगा।हालांकि कुछ लोगों का मानना है कि इसके बाद नरेंद्र मोदी के लिए निजी स्तर पर मुश्किलें बढ़ भी सकती हैं और पार्टी के भीतर और बाहर मोदी के विरोधी उनकी प्रभावी स्थिति पर नैतिकता के आधार पर सवाल उठा सकते हैं। साथ ही दंगों की जाँच प्रक्रिया में अगर इन बयानों को गंभीरता से लेते हुए कोई क़दम उठाया जाता है तो नरेंद्र मोदी के लिए आगे का रास्ता आसान नहीं रह जाएगा।

सोमवार, अक्तूबर 22, 2007

रोजगार गारंटी मामले में रिपोर्ट से पहले ही खलबली


अपनी बात
देश में जो बेरोजगार है वह मजदूर है। कम से कम राष्‍ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना की वास्‍तविकता तो यही है। काम अभी भी ठेकेदार के मनमुताबिक ही होता है। रोजगार के नाम पर खानापूर्ति से अधिक कुछ नहीं किया जा रहा है। आश्‍चर्य की बात तो यह कि सरकार इसे कामयाबी मान रही है। वैसे रोजगार प्रदान करने का जो मॉडल पेश किया गया है वह बेहतर है लेकिन कार्यन्‍वयन का जो तरीका है वह ठीक नहीं है। इस मामले में सरकार को कड़ाई से पेश आना चाहिए।


खबर अब तक
राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना का समय से बहुत पहले पूरे देश में विस्तार कर सरकार अपनी पीठ भले ही थपथपा रही हो, लेकिन इसके कार्यान्वयन पर अगले सप्ताह संभावित सीएजी की रिपोर्ट को लेकर आशंका भी घिर आई है। माना जा रहा है कि सफल बताई जा रही इस योजना पर सीएजी की रिपोर्ट के बाद कई सवाल उठ सकते हैं।
हाल में उपजी चुनावी संभावनाओं के बीच सरकार ने पांच साल का काम डेढ़ साल में पूरा कर लिया था। सरकार की ओर से एकबारगी पूरे देश में रोजगार गारंटी योजना का विस्तार कर दिया गया था, जबकि महज पांच-छह महीने पहले ही वित्त मंत्रालय तथा योजना आयोग ने कार्यान्वयन में खामियों के कारण विस्तार के प्रस्ताव पर आपत्तिजताई थी। अब केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्रालय के सामने फिर से वही सवाल उठने वाला है। दरअसल, कई स्तरों से आ रही शिकायतों के बाद केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री डा. रघुवंश प्रसाद सिंह ने अपनी पहल पर इसकी जांच का जिम्मा सीएजी को सौंप दिया था। आधिकारिक तौर पर जानकारी के लिए 62 जिलों के 200 ब्लाकों की जांच का निर्देश दिया गया था।
बताया जाता है कि 31 अक्टूबर को सीएजी अपनी रिपोर्ट सौंप सकता है। आशंका है कि इसके कार्यान्वयन को लेकर वही संदेह पुष्ट हो सकते हैं जो अब तक जताए जाते रहे हैं।
गौरतलब है कि योजना के कार्यान्वयन में सफल बताए जा रहे राज्य राजस्थान और मध्य प्रदेश से भी औपचारिक या अनौपचारिक रूप से शिकायतें आई हैं। कुछ जगहों पर ठेके पर योजना चलाने तो कई स्थानों से वाजिब मजदूरी का भुगतान न होने की शिकायत मिली है। खुद एनआरईजीए काउंसिल के सदस्यों की ओर से भी कई खामियों पर मंत्रालय का ध्यान दिलाया गया है। ऐसे में रघुवंश की ओर से जांच की पहल योजना के लिए तो अच्छी है, लेकिन मंत्रालय के अधिकारियों के लिए थोड़ी असुविधाजनक है। बताते हैं कि मंत्रालय के अंदर पहले भी इसका परोक्ष रूप से विरोध हो चुका है। अब जब रिपोर्ट आने वाली है तो जाहिर तौर पर आशंकाएं भी तेज हो गई हैं।

शुक्रवार, अक्तूबर 19, 2007

सेंसेक्स में जारी है सांप सीढ़ी का खेल


दो शब्‍द

शेयर बाजार जुआ घर से कम नहीं है। यहां कुछ लोग मालामाल हो रहे हैं तो कुछ लोग कंगाल। आम आदमी इनमें कही नहीं है। उसे तो अपने रोजी रोटी से फूर्सत ही कहां है। शेयर बाजार में उछाल अखबार की एक बड़ी खबर बन जाती है लेकिन लोकसरोकार से जुड़े मुद्दे कभी-कभार ही अखबारों में हेडलाइन बन पाती है। कारण साफ है- अब आमलोगों से खास लोगों को कोई मतलब नहीं है। मतलब है तो सिर्फ अपने पॉकेट से। कितना खाली होता है और कितना भरता है यह पॉकिट इस पर निर्भर करता है लोकसरोकार का मुद्दा।

अब खबर
देश के शेयर बाजार बुधवार को कारोबार शुरू होते ही इतने नीचे लुढ़क गए कि कारोबार को एक घंटे के लिए रोक देना पड़ा। बाद में केन्द्रीय वित्तमंत्री और सेबी द्वारा निवेशकों को भरोसा दिलाने से इनमें कुछ जान आई, लेकिन सत्र की समाप्ति पर बम्बई स्टॉक एक्सचेंज (बीएसई) का संवेदी सूचकांक (सेंसेक्स) 336 अंक और नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (एनएसई) का निफ्टी सूचकांक 109 अंक की भारी गिरावट के साथ बंद हुआ।शेयर बाजारों में विदेशी निवेशकों की ओर से आ रहे धन के प्रवाह पर अंकुश लगाने के सेबी के कल के प्रस्ताव से इतनी अफरा-तफरी फैल गई कि कारोबार शुरू होने के एक ही मिनट के भीतर सेंसेक्स डेढ़ हजार तथा निफ्टी पाँच सौ अंकों से अधिक नीचे फिसलकर निचले सर्किट पर आ गया। सेंसेक्स के करीब आठ प्रतिशत और निफ्टी के नौ प्रतिशत से ज्यादा नीचे जाने से नियमानुसार कारोबार को एक घंटे के लिए रोक देना पड़ा।इसके तुरंत बाद वित्तमंत्री पी. चिदंबरम ने कहा कि सरकार का पीएन (पार्टिसिपेटरी नोट) के जरिये शेयर बाजारों में विदेशी संस्थागत निवेशकों (एफआईआई) के निवेश पर रोक लगाने का कोई इरादा नहीं है, पर सरकार पीएन के जरिये निवेश की सीमा तय कर इसे नियंत्रित करना चाहती है। वित्तमंत्री ने कहा कि आम निवेशकों, एफआईआई और शेयर दलालों को इससे घबराने की जरूरत नहीं है।सेबी प्रमुख एम. दामोदरन ने भी कहा कि निवेशकों को अफवाहों पर ध्यान नहीं देना चाहिए। दामोदरन ने कहा कि पीएन के माध्यम से निवेश पर अंकुश लगाने का प्रस्ताव सोच-समझकर उठाया गया कदम है। इस पर सभी सम्बद्ध पक्षों से राय ली जाएगी। वित्तमंत्री और सेबी प्रमुख के बयानों के बाद बाजार में कुछ सुधार देखा गया।
बीयेसई के तीस शेयर आधारित सेंसेक्स 19000 अंक तक की अपनी यात्रा में किन-किन पड़ावों को कब-कब पार किया, प्रस्तुत है विस्तृत ब्योरा:-
1000 : 25 जुलाई, 1990
2000 : 03 जनवरी, 1992
3000 : 29 फरवरी, 1992
4000 : 30 मार्च, 1992
5000 : 08 अक्तूबर, 1999
6000 : 11 फरवरी, 2000
7000 : 20 जून, 2005
8000 : 08 सितंबर, 2005
9000 : 28 नवंबर, 2005
10000 : 06, फरवरी 2006
11000 : 21 मार्च, 2006
12000 : 20 अप्रैल 2006
13000 : 30 अक्टूबर, 2006
14000 : 05 दिसंबर, 2006
15000 : 06 जुलाई, 2007
16000 : 19 सितंबर, 2007
17000 : 26 सितंबर, 2007
18000 : 09 अक्टूबर, 2007
19000 : 15 अक्टूबर, 2007

बुधवार, अक्तूबर 17, 2007

समाज को बाँटने की कोशिश

दो शब्‍द
पंजाब और हरियाणा की तरक्‍की में बिहार और उत्‍तर प्रेदश के लोगों का बहुत बड़ा योगदान है। इन राज्‍यों में खेती का काम हो या कारखाने का बिहार और उत्‍तर प्रदेश के लोग सबसे ज्‍यादा मिल जाएंगे। राज्‍य के विकास में इनके योगदान को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। कुछ चरमपंथी लोग जो कि राज्‍य के विकास के दुश्‍मन हैं, यह नहीं चाहते कि इस राज्‍य के लोग यहां रहे और काम करे। यह विस्‍फोट उन्‍हीं लोगों की करतूत लगती है।

अब खबर
लुधियाना के श्रृंगार हाल के विस्फोट में मरने वालों और घायलों में कोई भी पंजाब का नहीं था। ये थे बिहार और उत्तरप्रदेश के ऐसे लोग जो पंजाब जाते हैं मजदूरी करने। कुछ कमाई करने। घर से दूर रह रहे इन लोगों के लिए छोटी-मोटी कम कीमत वाली फ़िल्में ही मनोरंजन का साधन हैं, लेकिन रविवार को यह मनोरंजन उन्हें महँगा पड़ गया।श्रृंगार हाल में यूँ तो तीन फिल्में चल रही थीं, लेकिन जहाँ धमाका हुआ वहाँ चल रही थी भोजपुरी फिल्मों के सुपरस्टार रवि किशन और मनोज तिवारी की 'जनम जनम का साथ'। लेकिन अब इन धमाकों ने कम से कम छह लोगों को उनके परिवारजनों से जनमों के लिए अलग कर दिया है और कई लोगों को अपना जीवन बिना हाथ या बिना पैर या फिर किसी और विकलांगता के साथ बिताने के लिए मजबूर कर दिया है।अस्पताल में अपने घायल रिश्तेदार से मिलने का इंतजार कर रहे राजकिशोर कहते हैं कि मेरे दो भाई थे फिल्म देखने वालों में। सुरेश भाई तो ठीक हैं, कम चोट आई है लेकिन छोटे भाई हरिकेश का पैर काटना पड़ा है। बस जान बच गई यही बहुत है।
लुधियाना में पिछले 15 वर्षों से रह रहे किशन कुमार दुबे बताते हैं कि उनके दो पड़ोसियों को धमाके में चोटें लगी हैं, जिन्हें वो देखने आए हैं। फैजाबाद के रहने वाले किशोर लुधियाना में कपड़े की कताई-बुनाई की फैक्टरी में काम करने वाले लाखों मजदूरों में से एक है। उनके दो मित्र बच गए लेकिन एक को हाथ गँवाना पड़ा है।अस्पताल में घायलों के साथ एक भी महिला देखने को नहीं मिली। वो शायद इसलिए क्योंकि कपड़ों की कताई-बुनाई का काम करने वाले ये मजदूर परिवारों के साथ नहीं रहते। बिहार के मदन धमाके के शॉक से अभी उबर भी नहीं पाए थे। उन्होंने डॉक्टर की मदद से अपनी बात कही।मदन कहते हैं- हम तो पीछे बैठे थे, जहाँ धमाका हुआ। हम भागे जोर से और भागते-भागते अपने घर तक आ गए। घर पहुँचे तो देखे कि हमको बहुत चोट लगी है और खून निकल रहा है। खून देखकर हम बेहोश हो गए। हमको हमारे साथी लोग अस्पताल में लेकर आए। अब देखिए पैर और मुँह में चोट लगी है।शिवशंकर के पैर में चोट है लेकिन वो हिम्मत करके कहते हैं- अब क्या कर सकते हैं। जो होना था वो तो हो गया। कम से कम इलाज में पैसा नहीं लग रहा है नहीं तो हम मजदूर लोग कैसे इलाज करा पाते।रामबरन, मेहराज, विनोद, हरिकेस, सरोज, ताहिर, गणेश... ये तमाम नाम घायलों की सूची में लिखे हैं। किसी ने टाँग गँवाई तो किसी ने हाथ...मजदूरी के लिए उठने वाले ये हाथ-पैर आगे क्या करेंगे ये पूछने की हिम्मत न तो मुझमें थी न ही वो बता पा रहे थे।
कुछ लोगों का कहना था कि बिहार और यूपी के लोगों को जानबूझकर निशाना बनाया गया, लेकिन कई लोग ऐसा नहीं मानते हैं। स्थानीय निवासी जग्गी बताते हैं कि शहर की आधी से अधिक आबादी बिहार और यूपी के लोगों की है, जो यहाँ के कारखानों में, खेतों और तमाम व्यवसायों में काम करते हैं।निशाना : लुधियाना में बाहर से आए लोगों की आबादी बीस लाख से अधिक है, जो स्थानीय आबादी से कुछ ही कम है। ये लोग अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।स्थानीय पत्रकार मोहित श्रीवास्तव कहते हैं- देखिए पंजाब की अर्थव्यवस्था में बिहार और यूपी के लोगों का बड़ा हाथ है। यहाँ के कारखानों में यही लोग काम करते हैं। पंजाबी न तो अब खेतों में काम करता है और न ही कारखानों में। सोचिए अगर सारे यूपी, बिहार वाले वापस चले गए तो क्या होगा। ये बात पंजाब के लोग समझते हैं। उन्हें भी अपना काम कराना है।लेकिन क्या ये धमाके बिहार और यूपी के लोगों को निशाना बना कर नहीं किए गए, वो कहते हैं कि बिलकुल ऐसा हो सकता है कि चरमपंथी तत्वों ने बिहार और यूपी के लोगों को निशाना बनाकर एक वैमनस्य का संदेश देने की कोशिश की है, लेकिन इससे वैमनस्य बढ़ेगा, ऐसा मुझे नहीं दिखता।
उल्लेखनीय है कि चरमपंथ के चरम काल में उग्रवादियों ने ऐसी कोशिश की थी कि बिहार और यूपी के लोग पंजाब छोड़कर वापस चले जाएँ लेकिन शायद दोनों पक्षों यानी पंजाब के धनाढ्य वर्ग और बिहार, यूपी के मज़दूर एक दूसरे की जरूरत बन चुके हैं। इसलिए ऐसा हुआ नहीं।
विशेषज्ञों का कहना है कि इन धमाकों के जरिये चरमपंथियों ने न केवल आतंक फैलाने की कोशिश की है बल्कि समाज को बाँटने की भी कोशिश की है।समाज कितना बँटेगा ये कहना जल्दबाजी होगी, लेकिन एक बात तय है कि आने वाले दिनों में बिहार और यूपी के मज़दूर थोड़ा डर कर, थोड़ा सहम कर और अत्यधिक चौकस रह कर ही काम कर पाएँगे।

साभार: बीबीसी और वेब दुनिया

कामरेडों के गढ़ से गरीबों के राशन की तस्करी

दो शब्‍द

गरीबों का राशन ब्‍लैक करना कोई नई बात नहीं है। सरकार की चले तो वह जन वितरण प्रणाली को ही बंद कर दे। अभी गरीबी रेखा के नीचे उसे माना जाता है जिसकी वार्षिक आमदनी 3600 रुपया है। इतने रूपये तो बड़े-बड़े शहर के चौराहे पर भीख मांगने वाला भिखारी भी प्रतिमाह कमा लेता है, तो क्‍या उसे गरीबी रेखा से उपर माना जाना ? सरकार की ऐसी ही नीति रही तो वह दिन दूर नहीं कि जब भूख से मरते लोगों की जिम्‍मेवारी सरकार की नहीं होगी इसके लिए वह स्‍वयं ही जिम्‍मेवार होगा।

अब खबर

राशन प्रणाली में खामियां निकालकर केंद्र की आए दिन फजीहत करने वाले कामरेडों के राज्य पश्चिम बंगाल में गरीबों के मुंह कानिवाला छीना जा रहा है। राशन के अनाज का एक बड़ा हिस्सा गरीबों की जगह तस्करी के मार्फत बांग्लादेश पहुंचाया जा रहा है। केंद्रीय कृषि व खाद्य मंत्री शरद पवार ने राज्य सरकार को इस तरह के गंभीर अपराध के खिलाफ सख्ती बरतने के निर्देश दिए हैं।
राशन प्रणाली के तहत वितरित होने वाले विभिन्न अनाज गरीबों तक पहुंचने से पहले ही खुले बाजार में बेच दिए जाते हैं। राशन की ऐसी चोरी का मामला लगभग सभी राज्यों में पाया गया है। लेकिन पश्चिम बंगाल में हालात बद से बदतर हैं। राज्य की राशन प्रणाली पर माफिया का कब्जा है। वे राशन को सस्ती दर की दुकानों पर पहुंचने से पहले ही हड़प कर जाते हैं। बाद में उसे तस्करी के मार्फत बांग्लादेश पहुंचा दिया जाता है।
पिछले दिनों राशन की समस्या को लेकर राज्य में जगह-जगह हंगामा हुआ। राज्य सरकार ने आनन-फानन केंद्र पर आरोप मढ़ दिया कि केंद्र से राशन की आपूर्ति नहीं होने से ऐसा हुआ। केंद्र ने भी बिना देर किए पश्चिम बंगाल का कच्चा चिट्ठा पेश कर राज्य सरकार की कलई खोल दी।
विश्व खाद्य दिवस पर आयोजित समारोह में हिस्सा लेने के बाद पवार ने एक सवाल के जवाब में कहा कि राशन के अनाजों की चोरी की शिकायतें पहले से ही मिल रही थीं। उन्होंने माना कि राशन दुकानों से गरीबी रेखा के ऊपर वाले उपभोक्ताओं के हिस्से के अनाज में सबसे अधिक चोरी होती हैं। राज्य सरकारों को इस बारे में बराबर आगाह किया जाता रहा है। पवार ने कहा कि पिछले सप्ताह ही पश्चिम बंगाल का एक प्रतिनिधिमंडल मिला था, उससे भी राशन के अनाज की तस्करी पर काबू पाने का आग्रह किया गया है।

साभार- दैनिक जागरण

रविवार, सितंबर 16, 2007

राम सेतु मसले पर उलझे मंत्री

खबर अभी तक
रामसेतु मामले पर उच्चतम न्यायालय में केन्द्र सरकार की ओर से दाखिल हलफनामे से जुड़े विवाद ने रविवार को नया मोड़ ले लिया और अपने मंत्रिमंडलीय सहयोगी जयराम रमेश की टिप्पणी की प्रतिक्रिया में संस्कृति मंत्री अम्बिका सोनी ने पद से इस्तीफा देने की पेशकश कर डाली।भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) के दो वरिष्ठ अधिकारियों के निलंबन और संस्थान की निदेशक और आईएएस अधिकारी अंशु वैश्य से स्पष्टीकरण माँगने के एक दिन बाद वाणिज्य राज्यमंत्री जयराम रमेश ने अम्बिका पर निशाना साधते हुए कहा कि उन्हें गलत तरीके से तैयार हलफनामे के मसौदे के बारे में कोई जानकारी नहीं थी। संप्रग प्रमुख सोनिया गाँधी से मुलाकात करने के बाद अम्बिका ने कहा कि यदि प्रधानमंत्री मनमोहनसिंह और संप्रग अध्यक्ष सोनिया गाँधी को लगता है कि मुझसे गलती हुई है और वे मेरा इस्तीफा चाहते हैं, तो मैं पद त्यागने में एक पल का भी वक्त नहीं लूँगी।
शीर्ष अदालत में इस सप्ताह दाखिल हलफनामे में कहा गया था कि भगवान राम या मानव निर्मित पुल रामसेतु के अस्तित्व से जुड़े कोई ऐतिहासिक साक्ष्य मौजूद नहीं हैं। इस हलफनामे पर सरकार को चौतरफा आलोचना का सामना करना पड़ा। हालाँकि इस हलफनामे को तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम करुणानिधि का समर्थन मिला है, जिनका दल जोर-शोर से सेतुसमुद्रम परियोजना का समर्थन कर रहा है। करुणानिधि ने कहा कि संप्रग गठबंधन का अहम सहयोगी दल द्रमुक अंत तक परियोजना के लिए लड़ाई लड़ेगा।
सरकार के लिए बड़ी मुसीबत खड़ी करने वाले हलफनामे को लेकर आलोचना की जद में आईं अम्बिका ने यह समझाने की कोशिश की कि उनके मंत्रालय ने इसमें कोई गलती नहीं की। उन्होंने कहा कि मंत्रालय ने सात सितंबर को तीन सुझाव दिए थे, जिनमें से दो पर अमल किया गया, लेकिन तीसरे को नजरअंदाज कर दिया गया। जापान दौरे से बीती रात लौटीं अम्बिका ने इस मामले में अपने मंत्रालय की भूमिका स्पष्ट करने कि लिए आज सुबह सोनिया से मुलाकात की। मुलाकात के बाद उन्होंने कहा कि संस्कृति मंत्रालय ने हलफनामे में तीन सुधार किए थे। इनमें से दो ठीक कर लिए गए थे, जबकि तीसरा गायब था।अम्बिका ने कहा कि विभागीय जाँच जारी है। हम पता लगाएँगे कि इसके लिए कौन जिम्मेदार है।
कोलकाता में वाणिज्य राज्यमंत्री जयराम रमेश ने कहा था कि यदि वे संस्कृति मंत्री होते तो उन्होंने इस मुद्दे पर इस्तीफा दे दिया होता। इसी टिप्पणी पर प्रतिक्रिया माँगने पर अम्बिका ने इस्तीफे की पेशकश की।रमेश ने कहा था कि हलफनामे का मसौदा भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने तैयार किया था और संस्कृति मंत्रालय को इस बारे में कोई जानकारी नहीं थी।

अपनी बात

बात आस्‍था और विश्‍वास की है। भगवान राम यहां के कण-कण में रचे बसे हैं। सरकार ने जो हलफनामा कोर्ट में दी थी उसमें राम के अस्तित्‍व पर सवाल खड़े किए बिना भी बात को कही जा सकती थी। हालांकि हलफनामा को वापस लेकर सरकार ने भले ही मामले को शांत करने की कोशिश की है लेकिन मुद्दा तो भाजपा और उसके सहयोगियों के हाथ लग ही गया है। आगे-आगे देखिए होता है क्‍या ?

नीतीश ने दिया जांच का आदेश

खबर से पहले दो शब्‍द

क्‍यों भटक रहा है बिहार
महात्‍मा बुद्ध और महावीर की धरती बिहार। जी हां बिहार का अतीत काफी समृद्ध रहा है। आपातकाल से मुक्ति के लिए छात्र आंदोलन की शुरूआत यही हुई। लोकतंत्र में नई बुलंदियों को स्‍थापित करने का श्रेय बिहार को ही जाता है। लेकिन आज वह अपने पथ से भटक गया है। लोकतंत्र भीड़तंत्र में बदल गई है। अपराधियों का जमघट लगते जा रहा है। सदन से लेकर बाहर तक अपराधियों ने कब्‍जा जमा लिया है। थाने में अश्‍लील नृत्‍य का आयोजन कराया जा रहा है। मं‍त्री जी ऐसे नृत्‍यों का उद्घाटन करने आते हैं। गरीबी अभिशाप तो है लेकिन यह बिहार के लिए कही ज्‍यादा है। राज्‍य में 30 प्रतिशत से ज्‍यादा लोग गरीबी रेखा से नीचे जी रहे हैं। प्रति व्‍यक्ति औसत आमदनी 4500 रू। है और तकरीबन 47 प्रतिशत लोग ही शिक्षित है। जो कभी देश में सबसे ज्‍यादा उन्‍नत राज्‍य हुआ करता था उसकी स्थिति ऐसी है। इसके लिए कौन जिम्‍मेवार है ?

खबर अब तक-
वैशाली के राजापाकड़ में ग्रामीणों द्वारा कथित ग्‍यारह चोरों की हत्या की घटना को राज्य सरकार ने गंभीरता से लिया है। मुख्यमंत्री ने इसकी उच्चस्तरीय जांच का निर्देश दिया है। पटना केन्द्रीय प्रक्षेत्र के आईजी राजवर्धन शर्मा को जांच का जिम्मा दिया गया है। वहीं सरकार ने घटना को अंजाम देने वालों के खिलाफ आपराधिक मुकदमा चलाने का निर्णय किया है। घटना की सूचना मिलने के बाद मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने मुख्य सचिव, गृह सचिव, पुलिस महानिदेशक, एडीजी मुख्यालय को मुख्यमंत्री आवास बुलाकर घटना और उसके बाद पुलिस द्वारा की जा रही कार्रवाई के बारे में पूरी जानकारी ली। नीतीश कुमार ने राज्य में अपराध और कानून-व्यवस्था की समीक्षा के लिए मुख्यमंत्री ने 15 सितम्बर को उच्चस्तरीय बैठक बुलाई है।

भागलपुर, नवादा, बेगूसराय, आदि में इस तरह की घटी घटनाओं को संदर्भित करते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि कारणों का पता लगना चाहिए। कहीं पुलिस अपनी कार्रवाई में पीछे तो नहीं रह जा रही जिसके कारण जनता को भूमिका अदा करना पड़ रहा है। नीतीश कुमार ने कहा कि यह अच्छा सिगनल है कि जनता अपराधियों का विरोध करने लगी है। ग्रामीणों द्वारा चोरों को पकड़ना बहादुरी है मगर मार देना कायरता। मानवाधिकार को ध्यान में रखते हुए पुलिस के हवाले किया जाना चाहिए। कानून को हाथ में लेने की किसी को इजाजत नहीं दी जा सकती। उन्होंने कहा कि इस तरह की घटना की पुनरावृत्तिन हो इसके लिए जन जागरण अभियान चले। गृह सचिव के अनुसार 15 सितम्बर को होने वाली समीक्षा बैठक में मुख्य सचिव, गृह सचिव, डीजीपी के साथ-साथ जिलों के एसपी, प्रक्षेत्रीय डीआईजी, आईजी व पुलिस मुख्यालय के वरीय अधिकारी हिस्सा लेंगे। उन्होंने कहा कि राजापाकड़ मामले में अब तक जो तथ्य सामने आए हैं उसमें हाल के महीनों में वहां चोरी के अनेक मामले दर्ज नहीं हैं।

मुख्यालय की रिपोर्ट के अनुसार जून से अब तक दो चोरी के मामले दर्ज हुए हैं। पटना केन्द्रीय प्रक्षेत्र के आईजी को एरिया सर्वे की जिम्मेदारी दी गई है। राजापाकड़ में मिथिलेश यादव के घर से लोग चोरी करके लौट रहे थे। ढेलपुरवा चौक के पास टैम्पू तय कर रहे थे। किसी बात पर उससे बकझक हुई और उसने हल्ला मचा दिया। तब लोग एकत्र हो गए और उसके बाद की घटना सामने है। इधर पुलिस मुख्यालय के प्रवक्ता आईजी अनिल कुमार सिन्हा ने कहा कि राजापाकड़ मामले में एक व्यक्ति बच गया है उसके बयान के आधार पर हमला करने वाले लोगों के विरुद्ध मुकदमा चलेगा। और स्पीडी ट्रायल कर उन्हें सजा दिलवाई जाएगी। उन्होने कहा कि पहले भी इस इलाके में इस तरह की घटनाएं हुई हैं। 1993 में थाना हाजत से एक मुल्जिम को छुड़ाकर उसे पीटकर मार डाला गया और दरोगा के भी हाथ-पांव तोड़ डाले गए थे। 1995 में करीब में ही पांच लोगों की हत्या पीटकर कर दी गई थी। इसके अतिरिक्त भी घटनाएं घटी हैं।

आखिर यह नौबत क्‍यों आई
बिहार में प्रशासन की स्थिति में कोई बदलाव नहीं हआ है। लोग शिकायत लेकर थाने जाते हैं तो कोई सुनने वाला नहीं है। चोरी की वारदात से तंग आकर गांव वालों ने भी शिकायत की थी लेकिन प्रशासन ने एक न सुनी। अगर समय पर उनकी बात सुन ली जाती तो शायद यह नौबत नहीं आती।
हालांकि गांववालों ने जो भी किया उसे किसी प्रकार से उचित नहीं कहा जा सकता।

गुरुवार, सितंबर 13, 2007

रामायणकाल का नहीं है 'रामसेतु' !

पूरे देश में विश्‍व हिन्‍दू परिषद् और उसके सहयोगी संगठन ने चक्‍का जाम कर आम जनजीवन को प्रभावित कर दिया। सच्‍चाई चाहे जो हो राजनीति से परहेज नहीं है। देश की जनता को परेशान करना प्रमुख प्राथमिकता बनती जा रही है। देश का हित हो न हो अपना हित होना चाहिए।
भाजपा, विहिप और उनके सहयोगी संगठनों को चाहिए कि देश के प्रति अपने दायित्‍व को थोडी़ गंभीरता से लें। सिर्फ भावनाएं और अंधभक्ति को बढा़वा देने मात्र से राष्‍ट्रप्रेम नहीं पनप सकता। इसके लिए जरूरी है कि इसे एक वैज्ञानिक और तार्किक आधार भी मिलें। आखिर कब तक ये लोग धर्म के नाम पर अंधविश्‍वास को बढ़ावा देकर अपनी राजनीति चमकाते रहेंगे ? अगर अपने देश के प्रति उन्‍हें थोड़ी भी जिम्‍मेवारी का अहसास है तो रामसेतु मामले में जो वैज्ञानिकों ने रिपोर्ट तैयार की है उसका अध्‍ययन जरूर करें।
ताजा रिपोर्ट में जो तथ्‍य सामने आ रहे हैं उसके अनुसार भारत और श्रीलंका के बीच समुद्र के समाए ढ़ाचे के रामायणकालीन होने की संभावना कतई नहीं है। वैज्ञानिकों ने इस ढ़ांचे के नमूने उठाए हैं और जांच के बाद नतीजा निकाला है कि वह 600 से लेकर 1600 साल तक ही पुराने हैं। उसे रामायण काल का तभी माना जा सकता है जब वह छह हजार साल से ज्‍यादा पुराना हो। संसद में इस मुद्दे पर हंगामा होने के बाद केंद्र सरकार ने राष्‍ट्रीय समुद्र विज्ञान संस्‍थान चेन्‍नई के जरिये इस ढ़ांचे की गहन पड़ताल करवाई है।
राष्‍ट्रीय समुद्र विज्ञान संस्‍थान चेन्‍नई के वैज्ञानिकों के एक दल ने दो सप्‍ताह तक भारत और श्रीलंका के बीच बने इस ढांचे का गहन अध्‍ययन किया। वैज्ञानिकों ने पानी के नीचे बने तथाकथित रामसेतु के ढांचे में छेद करके चट्टान के कई नमूने उठाए। उसकी कार्बन डेटिंग की गई। इसका मकसद एक तो इस ढांचे की गहराई का आकलन करना था दूसरे चट्टान की आयु तय करना था। वैज्ञानिकों की रिपोर्ट के नतीजे कहते हैं कि इन नमूनों की जांच की है और यह 600 से लेकर 1600 साल तक पुराने निकले हैं। इसलिए इसके रामायणकाल में निर्मित होने की पुष्टि नहीं होती है।
इस ढांचा के बनने के बारे में वैज्ञानिकों ने जो थ्‍योरी पेश की है वह यह है‍ कि यह स्‍थान अरब सागर और बंगाल की खाड़ी के स्‍थान पर है। दोनों तरफ के सागरों के पानी के वेग के कारण संभवत: यह ढांचा निर्मित हुआ था। वैज्ञानिकों का तर्क है कि ऐसा होना आम बात है। गंगा-यमुना के संगम इलाहाबाद में भी पानी के नीचे इस तरह की चट्टानें बनी हुई हैं।

क्‍या है सेतु समुद्रम परियोजना ?
*भारत के पश्चिमी समुद्र तट के जहाजों को पूर्वी तट पर पहुंचने के लिए श्रीलंका का पूरा चक्‍कर काट कर पहुंचना होता है क्‍योंकि भारत और श्रीलंका के बीच समुद्र की गहराई कम है। यहां पानी में एक ढांचा है जिसके रामायण काल में निर्मित पुल होने के दावे किए जाते हैं। सेतु समुद्रम परियोजना के तहत इस ढांचे की खुदाई करके उसे जहाजों के आवागमन के लायक बनाया जाएगा।

*योजना के तहत भारत और श्रीलंका के बीच पानी के भीतर 167 किमी ढांचे की खुदाई कर उसे गहरा किया जाना है ताकि जहाज वहां से गुजर सकें।

*इस योजना पर 2500 करोड़ रुपये का खर्च आएगा। 2008 तक इस योजना के पूरा होने के बाद यहां से जहाजों का आवागमन शुरू होने की उम्‍मीद है।

*इसके बनने से वेस्‍ट और ईस्‍ट कोस्‍ट की दूरी 650 किमी (350 समुद्री मील) कम हो जाएगी जिससे जहाजों का ईंधन तो बचेगा ही, समय भी कम लगेगा। इतना ही नहीं इसके पूरा होने के बाद वेस्‍ट-ईस्‍ट कोस्‍ट के बीच 13 छोटे पोर्ट बनाने की भी योजना है।

*रोचक बात यह है कि 1860 में भी इस तरह की योजना का खाका बना था। लेकिन उस पर काम नहीं हो सका। इस परियोजना पर अध्‍ययन के लिए अब तक 14 एक्‍सपर्ट कमिटियां बनी हैं जिनमें 9 ब्रिटिशकाल में बनी हैं।

*भाजपा, विहिप जैसे संगठनों का कहना है कि राम सेतु के साथ लोगों की भावनाएं जुड़ी हुई है इसलिए इसके स्‍वरूप के साथ छेड़छाड़ नहीं की जानी चाहिए, जबकि श्रीलंका सरकार ने इसे समुद्री जीवों के लिए खतरनाक बताते हुए एक विशेषज्ञ समिति का गठन किया है।

क्‍या कर रही है भाजपा और विहिप?
भाजपा और विहिप बातों को संभालने के बदले भड़काने का काम कर रही है। 12 सितंबर को पूरे देश में सड़क जाम होने की खबर मिली। लाखों लोगों को परेशानियों का सामना करना पड़ा।

और अंत में-
सकता है विहिप और भाजपा इसे सफलता माने लेकिन सच्‍चाई तो यही है कि भाजपा, विहिप और उसके सहयोगी संगठन जो कि इस आंदोलन से जुड़े हैं वे सच्‍चाई को लोगों के सामने नहीं ला रहे हैं। इस परियोजना से समुद्री जीवों को कुछ नुकसान होगा लेकिन भाजपा और उसके सहयोगी दल अगर अपना रवैया नहीं बदलते हैं तो इससे देश और यहां के निवासियों का कुछ ज्‍यादा ही नुकसान होगा। एक बात तो तय है कि तथाकथित 'रामसेतु' आंदोलन से विहिप और भाजपा का कल्‍याण होने वाला नहीं है।

सोमवार, सितंबर 10, 2007

नवाज शरीफ इस्लामाबाद पहुँचे

खबर अभी तक
पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ इस्लामाबाद पहुँच चुके हैं। शरीफ लंदन से मस्कट पहुँचे और वहाँ से पाकिस्तान एयर लाइंस की 786 उड़ान से इस्लामाबाद आए। कहा जा रहा है कि शरीफ के पासपोर्ट पर पाकिस्तान की सरजमीं पर उतरने की मुहर लगने के बाद उन्हें लाउंच में लाया जाएगा और फिर नाश्ता करवाने के बाद पाक सरकार उन्हें वापस जेद्धा जाने की शर्त रखेगी। पाकिस्तान के दो बार प्रधानमंत्री रह चुके नवाज शरीफ को 1999 में सत्ता से बेदखल कर दिया गया था। पाकिस्तान सरकार ने उन्हें दोबारा न लौटने की शर्त पर देश से बाहर कर दिया था। शरीफ का कहना है कि देश न लौटने का करार पाँच साल का था और अब सात साल गुजर चुके हैं।

कुछ सवाल भी
क्‍या पाकिस्‍तान में लोकतंत्र की बहाली का सपाना साकार हो पाएगा? क्‍या शरीफ को मात देने में सफल हो पाएंगे जनरल ? क्‍या शरीफ को कैद करने में सफल हो पाएंगे मुशर्रफ ?

रविवार, सितंबर 09, 2007

चैनल का यह कैसा न्‍याय !

पहले खबर अब तक
शिक्षिका उमा खुराना स्टिंग ऑपरेशन मामले में अपराध शाखा ने शनिवार को चैनल के सीईओ सुधीर चौधरी से लंबी पूछताछ की। पूछताछ में सीईओ ने चैनल का पक्ष रखते हुए कहा कि पूरे स्टिंग को रिपोर्टर ने अंजाम दिया था। उसकी मंशा या षड्यंत्र के बारे में चैनल को कोई जानकारी नहीं थी। इस पूछताछ के बाद पुलिस अधिकारी विधि विशेषज्ञों की राय ले रहे हैं, ताकि आगे की कार्रवाई की जा सके। इधर, इस मामले में गिरफ्तार रिपोर्टर प्रकाश सिंह को अदालत में पेश किया गया जहां से उसे सात दिनों के लिए न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया। हालांकि प्रकाश को सोमवार को भी अदालत में पेश किया जाएगा। दरअसल सोमवार को उमा खुराना की जमानत पर सुनवाई होनी है। इस दौरान आवाज के सैंपल के लिए पुलिस उमा के साथ प्रकाश को भी रिमांड पर लेना चाहती है। इसकी अर्जी पुलिस ने अदालत में लगाई थी जिसे अदालत ने स्वीकार कर लिया।
अपराध शाखा के उपायुक्त मधुप तिवारी के अनुसार इस प्रकरण में चैनल का पक्ष जानने के लिए सीआरपीसी की धारा-160 के तहत चैनल प्रबंधन को नोटिस देकर वहां से किसी प्रतिनिधि को शुक्रवार को बुलाया गया था, लेकिन शुक्रवार को चैनल प्रबंधन की ओर से कोई नहीं आया। लेकिन मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए शनिवार को चैनल के सीईओ सुधीर चौधरी अपराध शाखा के आरकेपुरम कार्यालय पहुंचे। वहां शाखा के उच्च अधिकारियों ने उनसे लंबी पूछताछ की। पुलिस ने उनका पूरा बयान दर्ज किया है। श्री चौधरी ने बताया कि उन्होंने स्टिंग को एक खबर की तरह दिखाया था। रिपोर्टर ने स्टिंग के बारे में जो जानकारियां दी थीं, उसी के अनुसार खबर चैनल पर प्रसारित की गई थी। उन्होंने इस बात से इनकार किया कि उन्हें या चैनल प्रबंधन को रिपोर्टर की मंशा या षड्यंत्र की जानकारी थी।
उनका कहना था कि रिपोर्टर प्रकाश सिंह, उसकी महिला पत्रकार मित्र और वीरेंद्र अरोड़ा के बारे में बाद में जानकारी मिली। पुलिस सूत्रों की मानें तो अब यह स्पष्ट हो गया है कि इस पूरे षड्यंत्र के पीछे प्रकाश सिंह और वीरेंद्र अरोड़ा का ही हाथ है।
ज्ञात हो कि गत 30 अगस्त को एक न्यूज चैनल में उमा खुराना नामक शिक्षिका को रुपये लेकर स्कूली छात्रा के जिस्म का सौदा करते दिखाया गया था। उमा खुराना आसफ अली रोड स्थित सरकारी स्कूल में शिक्षिका थी। टीवी पर इस खबर को देखते ही तुर्कमान गेट इलाके के लोगों ने स्कूल में घुसकर उग्र प्रदर्शन किया। उन्होंने पुलिस जिप्सी फूंकने के साथ दर्जनों गाड़ियों को क्षतिग्रस्त कर दिया। गिरफ्तारी के दौरान भी लोगों ने उमा से मारपीट की और उसके कपड़े फाड़ दिए थे।
लेकिन बाद में इस स्टिंग की सच्चाई के बारे में अलग ही कहानी सामने आई। पुलिस के अनुसार उमा खुराना का स्टिंग ऑपरेशन करने वाले रिपोर्टर प्रकाश सिंह ने अपनी मित्र तथा पेशे से पत्रकार युवती के साथ मिलकर इस पूरे मामले को धोखे से गलत तथ्यों के साथ शूट किया। इस काम में वीरेंद्र अरोड़ा ने इनकी मदद की। क्योंकि उमा ने वीरेंद्र से किसी बिजनेस के सिलसिले में कर्ज ले रखा था जिसे अभी वह लौटाने की स्थिति में नहीं थी। मामले के काफी पेचीदा हो जाने के बाद इसकी जांच की जिम्मेदारी मध्य जिला पुलिस से लेकर अपराध शाखा को सौंपी गई। पुलिस ने उमा की गिरफ्तारी के बाद उसके साथी वीरेंद्र अरोड़ा को गिरफ्तार किया। फिर पुलिस ने स्टिंग में स्कूली छात्रा बनी नोएडा की युवती को गिरफ्तार कर लिया। इसके बाद शुक्रवार को पुलिस ने रिपोर्टर प्रकाश सिंह को भी गिरफ्तार कर लिया।

अब खबर से जुडे कुछ सवाल
इन सारे तथ्‍यों से एक बात स्‍पष्‍ट हो जाता है कि चैनल किसी भी प्रकार से रिपोर्टर की जिम्‍मेवारी नहीं लेना चाहता है। यह कैसा न्‍याय है ? क्‍या चैनल के संचालक यह कहना चाहते हैं कि उनके यहां काम करने वाले रिपोर्टर अपनी जिम्‍मेवारी पर कोई रिपोर्ट पेश करते हैं ? चैनल का उस रिपोर्ट से कुछ लेना देना नहीं होता ? लेकिन जब रिपोर्ट पेश की जार रही थी उस समय चैनल हेड अपनी पीठ थपथपाने से नहीं चुक रहे थे। फिर अभी अपने आप को अलग क्‍यों कर रहे हैं ? सरकार इन सारे प्रकरणों पर गौर करें और यह निधार्रित करें कि इस मामले में दोहरी नीति नहीं अपनाया जाए। अगर अ‍‍भिव्‍यक्ति की स्‍वतंत्रता की आड़ में किसी की व्‍यक्तिगत स्‍वतंत्रता का हनन होता है तो यह ठीक नहीं है।

शनिवार, सितंबर 08, 2007

स्टिंग ऑपरेशन का सच

स्कूली लड़कियों को जिस्मफरोशी के धंधे में धकेलने की बात स्टिंग ऑपरेशन में दिखाने पर दिल्ली सरकार ने उमा खुराना को बर्खास्त कर दिया। चैनल ने भी वाहवाही बटोरी लेकिन अब सच सामने आने लगा है। अब इस मामले में कुछ ऐसा नहीं बचा है जिसके आधार पर कहा जाए की स्टिंग में सच्‍चाई हो सकती है। स्टिंग करने वाले पत्रकार जेल में है। इस सब में शामिल लड़की भी जेल में है। बताया जा रहा है कि पहले भी कई मामले में उस लड़की का नाम उछलते रहा है। निर्भिक नाम से वह एक पत्रिका भी निकालती थी जिसमें नोएडा के दो बिल्‍डरों का पैसा लगा था।

स्टिंग की सच्‍चाई सामने आने के बाद कई सवाल उठ खड़े हुए हैं। पहला सवाल यह कि क्‍या इस प्रकार के स्टिंग ऑपरेशन से पत्रकारिता जगत में स्टिंग की विश्‍वसनीयता कितनी रह जाएगी ? दूसरा सवाल इस मामले में अगर कोई निर्दोष फंसता है तो सरकार और उस चैनल की क्‍या जिम्‍मेवारी बनती है ? तीसरा सवाल जो सबसे अहम है कि क्‍या इस प्रकार के स्टिंग ऑपरेशन को बढावा दिया जाना चाहिए ?

गुरुवार, मार्च 29, 2007

खेल को खेल ही रहने दो या फिर ......

क्रिकेट का बुखार अभी उतरा नहीं है लेकिन टीम इंडिया टुकड़ों में लौट रही है. गुरू ग्रेग का अभियान उनके शिष्यों के आत्‍मसमर्पण करने के साथ ही समाप्‍त हो गया। लोगों ने जिन क्रिकेटरों को भगवान की तरह पूजा वही क्रिकेटर अपने भक्‍तों को निराश कर खाली हाथ लौट रहे हैं। देश में कही मुंडन हो रहा है तो कही आत्‍महत्‍या की कोशिश। आखिर यह जुनून क्‍यों ?
क्रिकेटरों ने विज्ञापन जगत में जितना पैसा कमाया है उतना बॉलीवुड के अभिनेताओं के हाथ भी नहीं लगे हैं। यह सही है कि क्रिकेटरों को पेशेवर होना चाहिए लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि अपने खेल का मौलिक प्रदर्शन भी भूल जाए। विश्व के सम्‍मानित बल्‍लेबाज होने का यह मतलब तो नहीं कि वह बरमुडा जैसे नवसिखुए देश के रहमोकरम पर आगे बढ़ने की स्थि‍ति में आ जाए। लकिन यही कुछ दिखा टीम इंडिया के साथ। आखिर ऐसा नाम किस काम का
?
इन सब विवादों और प्रश्नों के बीच यह निर्विवाद रूप से सत्‍य है कि क्रिकेट अनिश्चितताओं से भरा खेल है। कुछ नहीं कहा जा सकता कि आगे क्‍या होगा ? क्‍या ऐसे में अपने पर नियंत्रण खोकर क्रिकेट का भला कर पाएंगे ? आपका क्‍या विचार है ? खेल को खेल ही रहने दिया जाए या फिर उसे देश की प्रतिष्‍ठा और मजहब के रूप में प्रतिस्‍थापित कर दिया जाए?

बुधवार, मार्च 28, 2007

चुनावी जंग में आम आदमी

चुनावी जंग में आम आदमी की स्थिति एक बार फिर महत्‍वपूर्ण हो गई। ऐसा सिर्फ पांच साल में एक बार दिखने को मिलता है। नेताओं के हाथ जुड़ जाते हैं और चुनाव जीतने के बाद वह हाथ अलविदा कहता हुआ दिखता है। अलविदा का यह हाथ पांच सालों के लिए होता है। आम आदमी की जिंदगी फिर से रोजी रोटी की तलाश में जुट जाती है। इस दौरान यह पता नहीं चलता है कि वह पांच साल कब गुजर गए और दूसरा पांच साल फिर से सामने आ गया। इसका एहसास नेताओं के हाथ जोड़ने के बाद ही पता चलता है।
यह सिलसिला आज से नहीं पिछले छह दशक से जारी है। गरीबी की मार झेल रहे लोगों में कोई बदलाव नहीं आया है। सरकारी आंकड़ों का खेल खुब हुआ इस बीच। हकीकत अभी भी यही है कि इस देश में मुट्ठी भर लोग धनी होते जा रहे हैं और जो गरीब थे वह दिन प्रति दिन और भी गरीब होते जा रहे हैं। सरकार की नीति आज भी चंद लोगों की रखवाली में जुटी रहती है या फिर उसी के इर्द गिर्द घुमती रहती है। विश्वास न हो तो सेज का उदाहरण आपके सामने है।