गुरुवार, मार्च 29, 2007

खेल को खेल ही रहने दो या फिर ......

क्रिकेट का बुखार अभी उतरा नहीं है लेकिन टीम इंडिया टुकड़ों में लौट रही है. गुरू ग्रेग का अभियान उनके शिष्यों के आत्‍मसमर्पण करने के साथ ही समाप्‍त हो गया। लोगों ने जिन क्रिकेटरों को भगवान की तरह पूजा वही क्रिकेटर अपने भक्‍तों को निराश कर खाली हाथ लौट रहे हैं। देश में कही मुंडन हो रहा है तो कही आत्‍महत्‍या की कोशिश। आखिर यह जुनून क्‍यों ?
क्रिकेटरों ने विज्ञापन जगत में जितना पैसा कमाया है उतना बॉलीवुड के अभिनेताओं के हाथ भी नहीं लगे हैं। यह सही है कि क्रिकेटरों को पेशेवर होना चाहिए लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि अपने खेल का मौलिक प्रदर्शन भी भूल जाए। विश्व के सम्‍मानित बल्‍लेबाज होने का यह मतलब तो नहीं कि वह बरमुडा जैसे नवसिखुए देश के रहमोकरम पर आगे बढ़ने की स्थि‍ति में आ जाए। लकिन यही कुछ दिखा टीम इंडिया के साथ। आखिर ऐसा नाम किस काम का
?
इन सब विवादों और प्रश्नों के बीच यह निर्विवाद रूप से सत्‍य है कि क्रिकेट अनिश्चितताओं से भरा खेल है। कुछ नहीं कहा जा सकता कि आगे क्‍या होगा ? क्‍या ऐसे में अपने पर नियंत्रण खोकर क्रिकेट का भला कर पाएंगे ? आपका क्‍या विचार है ? खेल को खेल ही रहने दिया जाए या फिर उसे देश की प्रतिष्‍ठा और मजहब के रूप में प्रतिस्‍थापित कर दिया जाए?

बुधवार, मार्च 28, 2007

चुनावी जंग में आम आदमी

चुनावी जंग में आम आदमी की स्थिति एक बार फिर महत्‍वपूर्ण हो गई। ऐसा सिर्फ पांच साल में एक बार दिखने को मिलता है। नेताओं के हाथ जुड़ जाते हैं और चुनाव जीतने के बाद वह हाथ अलविदा कहता हुआ दिखता है। अलविदा का यह हाथ पांच सालों के लिए होता है। आम आदमी की जिंदगी फिर से रोजी रोटी की तलाश में जुट जाती है। इस दौरान यह पता नहीं चलता है कि वह पांच साल कब गुजर गए और दूसरा पांच साल फिर से सामने आ गया। इसका एहसास नेताओं के हाथ जोड़ने के बाद ही पता चलता है।
यह सिलसिला आज से नहीं पिछले छह दशक से जारी है। गरीबी की मार झेल रहे लोगों में कोई बदलाव नहीं आया है। सरकारी आंकड़ों का खेल खुब हुआ इस बीच। हकीकत अभी भी यही है कि इस देश में मुट्ठी भर लोग धनी होते जा रहे हैं और जो गरीब थे वह दिन प्रति दिन और भी गरीब होते जा रहे हैं। सरकार की नीति आज भी चंद लोगों की रखवाली में जुटी रहती है या फिर उसी के इर्द गिर्द घुमती रहती है। विश्वास न हो तो सेज का उदाहरण आपके सामने है।