रविवार, सितंबर 16, 2007

राम सेतु मसले पर उलझे मंत्री

खबर अभी तक
रामसेतु मामले पर उच्चतम न्यायालय में केन्द्र सरकार की ओर से दाखिल हलफनामे से जुड़े विवाद ने रविवार को नया मोड़ ले लिया और अपने मंत्रिमंडलीय सहयोगी जयराम रमेश की टिप्पणी की प्रतिक्रिया में संस्कृति मंत्री अम्बिका सोनी ने पद से इस्तीफा देने की पेशकश कर डाली।भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) के दो वरिष्ठ अधिकारियों के निलंबन और संस्थान की निदेशक और आईएएस अधिकारी अंशु वैश्य से स्पष्टीकरण माँगने के एक दिन बाद वाणिज्य राज्यमंत्री जयराम रमेश ने अम्बिका पर निशाना साधते हुए कहा कि उन्हें गलत तरीके से तैयार हलफनामे के मसौदे के बारे में कोई जानकारी नहीं थी। संप्रग प्रमुख सोनिया गाँधी से मुलाकात करने के बाद अम्बिका ने कहा कि यदि प्रधानमंत्री मनमोहनसिंह और संप्रग अध्यक्ष सोनिया गाँधी को लगता है कि मुझसे गलती हुई है और वे मेरा इस्तीफा चाहते हैं, तो मैं पद त्यागने में एक पल का भी वक्त नहीं लूँगी।
शीर्ष अदालत में इस सप्ताह दाखिल हलफनामे में कहा गया था कि भगवान राम या मानव निर्मित पुल रामसेतु के अस्तित्व से जुड़े कोई ऐतिहासिक साक्ष्य मौजूद नहीं हैं। इस हलफनामे पर सरकार को चौतरफा आलोचना का सामना करना पड़ा। हालाँकि इस हलफनामे को तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम करुणानिधि का समर्थन मिला है, जिनका दल जोर-शोर से सेतुसमुद्रम परियोजना का समर्थन कर रहा है। करुणानिधि ने कहा कि संप्रग गठबंधन का अहम सहयोगी दल द्रमुक अंत तक परियोजना के लिए लड़ाई लड़ेगा।
सरकार के लिए बड़ी मुसीबत खड़ी करने वाले हलफनामे को लेकर आलोचना की जद में आईं अम्बिका ने यह समझाने की कोशिश की कि उनके मंत्रालय ने इसमें कोई गलती नहीं की। उन्होंने कहा कि मंत्रालय ने सात सितंबर को तीन सुझाव दिए थे, जिनमें से दो पर अमल किया गया, लेकिन तीसरे को नजरअंदाज कर दिया गया। जापान दौरे से बीती रात लौटीं अम्बिका ने इस मामले में अपने मंत्रालय की भूमिका स्पष्ट करने कि लिए आज सुबह सोनिया से मुलाकात की। मुलाकात के बाद उन्होंने कहा कि संस्कृति मंत्रालय ने हलफनामे में तीन सुधार किए थे। इनमें से दो ठीक कर लिए गए थे, जबकि तीसरा गायब था।अम्बिका ने कहा कि विभागीय जाँच जारी है। हम पता लगाएँगे कि इसके लिए कौन जिम्मेदार है।
कोलकाता में वाणिज्य राज्यमंत्री जयराम रमेश ने कहा था कि यदि वे संस्कृति मंत्री होते तो उन्होंने इस मुद्दे पर इस्तीफा दे दिया होता। इसी टिप्पणी पर प्रतिक्रिया माँगने पर अम्बिका ने इस्तीफे की पेशकश की।रमेश ने कहा था कि हलफनामे का मसौदा भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने तैयार किया था और संस्कृति मंत्रालय को इस बारे में कोई जानकारी नहीं थी।

अपनी बात

बात आस्‍था और विश्‍वास की है। भगवान राम यहां के कण-कण में रचे बसे हैं। सरकार ने जो हलफनामा कोर्ट में दी थी उसमें राम के अस्तित्‍व पर सवाल खड़े किए बिना भी बात को कही जा सकती थी। हालांकि हलफनामा को वापस लेकर सरकार ने भले ही मामले को शांत करने की कोशिश की है लेकिन मुद्दा तो भाजपा और उसके सहयोगियों के हाथ लग ही गया है। आगे-आगे देखिए होता है क्‍या ?

नीतीश ने दिया जांच का आदेश

खबर से पहले दो शब्‍द

क्‍यों भटक रहा है बिहार
महात्‍मा बुद्ध और महावीर की धरती बिहार। जी हां बिहार का अतीत काफी समृद्ध रहा है। आपातकाल से मुक्ति के लिए छात्र आंदोलन की शुरूआत यही हुई। लोकतंत्र में नई बुलंदियों को स्‍थापित करने का श्रेय बिहार को ही जाता है। लेकिन आज वह अपने पथ से भटक गया है। लोकतंत्र भीड़तंत्र में बदल गई है। अपराधियों का जमघट लगते जा रहा है। सदन से लेकर बाहर तक अपराधियों ने कब्‍जा जमा लिया है। थाने में अश्‍लील नृत्‍य का आयोजन कराया जा रहा है। मं‍त्री जी ऐसे नृत्‍यों का उद्घाटन करने आते हैं। गरीबी अभिशाप तो है लेकिन यह बिहार के लिए कही ज्‍यादा है। राज्‍य में 30 प्रतिशत से ज्‍यादा लोग गरीबी रेखा से नीचे जी रहे हैं। प्रति व्‍यक्ति औसत आमदनी 4500 रू। है और तकरीबन 47 प्रतिशत लोग ही शिक्षित है। जो कभी देश में सबसे ज्‍यादा उन्‍नत राज्‍य हुआ करता था उसकी स्थिति ऐसी है। इसके लिए कौन जिम्‍मेवार है ?

खबर अब तक-
वैशाली के राजापाकड़ में ग्रामीणों द्वारा कथित ग्‍यारह चोरों की हत्या की घटना को राज्य सरकार ने गंभीरता से लिया है। मुख्यमंत्री ने इसकी उच्चस्तरीय जांच का निर्देश दिया है। पटना केन्द्रीय प्रक्षेत्र के आईजी राजवर्धन शर्मा को जांच का जिम्मा दिया गया है। वहीं सरकार ने घटना को अंजाम देने वालों के खिलाफ आपराधिक मुकदमा चलाने का निर्णय किया है। घटना की सूचना मिलने के बाद मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने मुख्य सचिव, गृह सचिव, पुलिस महानिदेशक, एडीजी मुख्यालय को मुख्यमंत्री आवास बुलाकर घटना और उसके बाद पुलिस द्वारा की जा रही कार्रवाई के बारे में पूरी जानकारी ली। नीतीश कुमार ने राज्य में अपराध और कानून-व्यवस्था की समीक्षा के लिए मुख्यमंत्री ने 15 सितम्बर को उच्चस्तरीय बैठक बुलाई है।

भागलपुर, नवादा, बेगूसराय, आदि में इस तरह की घटी घटनाओं को संदर्भित करते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि कारणों का पता लगना चाहिए। कहीं पुलिस अपनी कार्रवाई में पीछे तो नहीं रह जा रही जिसके कारण जनता को भूमिका अदा करना पड़ रहा है। नीतीश कुमार ने कहा कि यह अच्छा सिगनल है कि जनता अपराधियों का विरोध करने लगी है। ग्रामीणों द्वारा चोरों को पकड़ना बहादुरी है मगर मार देना कायरता। मानवाधिकार को ध्यान में रखते हुए पुलिस के हवाले किया जाना चाहिए। कानून को हाथ में लेने की किसी को इजाजत नहीं दी जा सकती। उन्होंने कहा कि इस तरह की घटना की पुनरावृत्तिन हो इसके लिए जन जागरण अभियान चले। गृह सचिव के अनुसार 15 सितम्बर को होने वाली समीक्षा बैठक में मुख्य सचिव, गृह सचिव, डीजीपी के साथ-साथ जिलों के एसपी, प्रक्षेत्रीय डीआईजी, आईजी व पुलिस मुख्यालय के वरीय अधिकारी हिस्सा लेंगे। उन्होंने कहा कि राजापाकड़ मामले में अब तक जो तथ्य सामने आए हैं उसमें हाल के महीनों में वहां चोरी के अनेक मामले दर्ज नहीं हैं।

मुख्यालय की रिपोर्ट के अनुसार जून से अब तक दो चोरी के मामले दर्ज हुए हैं। पटना केन्द्रीय प्रक्षेत्र के आईजी को एरिया सर्वे की जिम्मेदारी दी गई है। राजापाकड़ में मिथिलेश यादव के घर से लोग चोरी करके लौट रहे थे। ढेलपुरवा चौक के पास टैम्पू तय कर रहे थे। किसी बात पर उससे बकझक हुई और उसने हल्ला मचा दिया। तब लोग एकत्र हो गए और उसके बाद की घटना सामने है। इधर पुलिस मुख्यालय के प्रवक्ता आईजी अनिल कुमार सिन्हा ने कहा कि राजापाकड़ मामले में एक व्यक्ति बच गया है उसके बयान के आधार पर हमला करने वाले लोगों के विरुद्ध मुकदमा चलेगा। और स्पीडी ट्रायल कर उन्हें सजा दिलवाई जाएगी। उन्होने कहा कि पहले भी इस इलाके में इस तरह की घटनाएं हुई हैं। 1993 में थाना हाजत से एक मुल्जिम को छुड़ाकर उसे पीटकर मार डाला गया और दरोगा के भी हाथ-पांव तोड़ डाले गए थे। 1995 में करीब में ही पांच लोगों की हत्या पीटकर कर दी गई थी। इसके अतिरिक्त भी घटनाएं घटी हैं।

आखिर यह नौबत क्‍यों आई
बिहार में प्रशासन की स्थिति में कोई बदलाव नहीं हआ है। लोग शिकायत लेकर थाने जाते हैं तो कोई सुनने वाला नहीं है। चोरी की वारदात से तंग आकर गांव वालों ने भी शिकायत की थी लेकिन प्रशासन ने एक न सुनी। अगर समय पर उनकी बात सुन ली जाती तो शायद यह नौबत नहीं आती।
हालांकि गांववालों ने जो भी किया उसे किसी प्रकार से उचित नहीं कहा जा सकता।

गुरुवार, सितंबर 13, 2007

रामायणकाल का नहीं है 'रामसेतु' !

पूरे देश में विश्‍व हिन्‍दू परिषद् और उसके सहयोगी संगठन ने चक्‍का जाम कर आम जनजीवन को प्रभावित कर दिया। सच्‍चाई चाहे जो हो राजनीति से परहेज नहीं है। देश की जनता को परेशान करना प्रमुख प्राथमिकता बनती जा रही है। देश का हित हो न हो अपना हित होना चाहिए।
भाजपा, विहिप और उनके सहयोगी संगठनों को चाहिए कि देश के प्रति अपने दायित्‍व को थोडी़ गंभीरता से लें। सिर्फ भावनाएं और अंधभक्ति को बढा़वा देने मात्र से राष्‍ट्रप्रेम नहीं पनप सकता। इसके लिए जरूरी है कि इसे एक वैज्ञानिक और तार्किक आधार भी मिलें। आखिर कब तक ये लोग धर्म के नाम पर अंधविश्‍वास को बढ़ावा देकर अपनी राजनीति चमकाते रहेंगे ? अगर अपने देश के प्रति उन्‍हें थोड़ी भी जिम्‍मेवारी का अहसास है तो रामसेतु मामले में जो वैज्ञानिकों ने रिपोर्ट तैयार की है उसका अध्‍ययन जरूर करें।
ताजा रिपोर्ट में जो तथ्‍य सामने आ रहे हैं उसके अनुसार भारत और श्रीलंका के बीच समुद्र के समाए ढ़ाचे के रामायणकालीन होने की संभावना कतई नहीं है। वैज्ञानिकों ने इस ढ़ांचे के नमूने उठाए हैं और जांच के बाद नतीजा निकाला है कि वह 600 से लेकर 1600 साल तक ही पुराने हैं। उसे रामायण काल का तभी माना जा सकता है जब वह छह हजार साल से ज्‍यादा पुराना हो। संसद में इस मुद्दे पर हंगामा होने के बाद केंद्र सरकार ने राष्‍ट्रीय समुद्र विज्ञान संस्‍थान चेन्‍नई के जरिये इस ढ़ांचे की गहन पड़ताल करवाई है।
राष्‍ट्रीय समुद्र विज्ञान संस्‍थान चेन्‍नई के वैज्ञानिकों के एक दल ने दो सप्‍ताह तक भारत और श्रीलंका के बीच बने इस ढांचे का गहन अध्‍ययन किया। वैज्ञानिकों ने पानी के नीचे बने तथाकथित रामसेतु के ढांचे में छेद करके चट्टान के कई नमूने उठाए। उसकी कार्बन डेटिंग की गई। इसका मकसद एक तो इस ढांचे की गहराई का आकलन करना था दूसरे चट्टान की आयु तय करना था। वैज्ञानिकों की रिपोर्ट के नतीजे कहते हैं कि इन नमूनों की जांच की है और यह 600 से लेकर 1600 साल तक पुराने निकले हैं। इसलिए इसके रामायणकाल में निर्मित होने की पुष्टि नहीं होती है।
इस ढांचा के बनने के बारे में वैज्ञानिकों ने जो थ्‍योरी पेश की है वह यह है‍ कि यह स्‍थान अरब सागर और बंगाल की खाड़ी के स्‍थान पर है। दोनों तरफ के सागरों के पानी के वेग के कारण संभवत: यह ढांचा निर्मित हुआ था। वैज्ञानिकों का तर्क है कि ऐसा होना आम बात है। गंगा-यमुना के संगम इलाहाबाद में भी पानी के नीचे इस तरह की चट्टानें बनी हुई हैं।

क्‍या है सेतु समुद्रम परियोजना ?
*भारत के पश्चिमी समुद्र तट के जहाजों को पूर्वी तट पर पहुंचने के लिए श्रीलंका का पूरा चक्‍कर काट कर पहुंचना होता है क्‍योंकि भारत और श्रीलंका के बीच समुद्र की गहराई कम है। यहां पानी में एक ढांचा है जिसके रामायण काल में निर्मित पुल होने के दावे किए जाते हैं। सेतु समुद्रम परियोजना के तहत इस ढांचे की खुदाई करके उसे जहाजों के आवागमन के लायक बनाया जाएगा।

*योजना के तहत भारत और श्रीलंका के बीच पानी के भीतर 167 किमी ढांचे की खुदाई कर उसे गहरा किया जाना है ताकि जहाज वहां से गुजर सकें।

*इस योजना पर 2500 करोड़ रुपये का खर्च आएगा। 2008 तक इस योजना के पूरा होने के बाद यहां से जहाजों का आवागमन शुरू होने की उम्‍मीद है।

*इसके बनने से वेस्‍ट और ईस्‍ट कोस्‍ट की दूरी 650 किमी (350 समुद्री मील) कम हो जाएगी जिससे जहाजों का ईंधन तो बचेगा ही, समय भी कम लगेगा। इतना ही नहीं इसके पूरा होने के बाद वेस्‍ट-ईस्‍ट कोस्‍ट के बीच 13 छोटे पोर्ट बनाने की भी योजना है।

*रोचक बात यह है कि 1860 में भी इस तरह की योजना का खाका बना था। लेकिन उस पर काम नहीं हो सका। इस परियोजना पर अध्‍ययन के लिए अब तक 14 एक्‍सपर्ट कमिटियां बनी हैं जिनमें 9 ब्रिटिशकाल में बनी हैं।

*भाजपा, विहिप जैसे संगठनों का कहना है कि राम सेतु के साथ लोगों की भावनाएं जुड़ी हुई है इसलिए इसके स्‍वरूप के साथ छेड़छाड़ नहीं की जानी चाहिए, जबकि श्रीलंका सरकार ने इसे समुद्री जीवों के लिए खतरनाक बताते हुए एक विशेषज्ञ समिति का गठन किया है।

क्‍या कर रही है भाजपा और विहिप?
भाजपा और विहिप बातों को संभालने के बदले भड़काने का काम कर रही है। 12 सितंबर को पूरे देश में सड़क जाम होने की खबर मिली। लाखों लोगों को परेशानियों का सामना करना पड़ा।

और अंत में-
सकता है विहिप और भाजपा इसे सफलता माने लेकिन सच्‍चाई तो यही है कि भाजपा, विहिप और उसके सहयोगी संगठन जो कि इस आंदोलन से जुड़े हैं वे सच्‍चाई को लोगों के सामने नहीं ला रहे हैं। इस परियोजना से समुद्री जीवों को कुछ नुकसान होगा लेकिन भाजपा और उसके सहयोगी दल अगर अपना रवैया नहीं बदलते हैं तो इससे देश और यहां के निवासियों का कुछ ज्‍यादा ही नुकसान होगा। एक बात तो तय है कि तथाकथित 'रामसेतु' आंदोलन से विहिप और भाजपा का कल्‍याण होने वाला नहीं है।

सोमवार, सितंबर 10, 2007

नवाज शरीफ इस्लामाबाद पहुँचे

खबर अभी तक
पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ इस्लामाबाद पहुँच चुके हैं। शरीफ लंदन से मस्कट पहुँचे और वहाँ से पाकिस्तान एयर लाइंस की 786 उड़ान से इस्लामाबाद आए। कहा जा रहा है कि शरीफ के पासपोर्ट पर पाकिस्तान की सरजमीं पर उतरने की मुहर लगने के बाद उन्हें लाउंच में लाया जाएगा और फिर नाश्ता करवाने के बाद पाक सरकार उन्हें वापस जेद्धा जाने की शर्त रखेगी। पाकिस्तान के दो बार प्रधानमंत्री रह चुके नवाज शरीफ को 1999 में सत्ता से बेदखल कर दिया गया था। पाकिस्तान सरकार ने उन्हें दोबारा न लौटने की शर्त पर देश से बाहर कर दिया था। शरीफ का कहना है कि देश न लौटने का करार पाँच साल का था और अब सात साल गुजर चुके हैं।

कुछ सवाल भी
क्‍या पाकिस्‍तान में लोकतंत्र की बहाली का सपाना साकार हो पाएगा? क्‍या शरीफ को मात देने में सफल हो पाएंगे जनरल ? क्‍या शरीफ को कैद करने में सफल हो पाएंगे मुशर्रफ ?

रविवार, सितंबर 09, 2007

चैनल का यह कैसा न्‍याय !

पहले खबर अब तक
शिक्षिका उमा खुराना स्टिंग ऑपरेशन मामले में अपराध शाखा ने शनिवार को चैनल के सीईओ सुधीर चौधरी से लंबी पूछताछ की। पूछताछ में सीईओ ने चैनल का पक्ष रखते हुए कहा कि पूरे स्टिंग को रिपोर्टर ने अंजाम दिया था। उसकी मंशा या षड्यंत्र के बारे में चैनल को कोई जानकारी नहीं थी। इस पूछताछ के बाद पुलिस अधिकारी विधि विशेषज्ञों की राय ले रहे हैं, ताकि आगे की कार्रवाई की जा सके। इधर, इस मामले में गिरफ्तार रिपोर्टर प्रकाश सिंह को अदालत में पेश किया गया जहां से उसे सात दिनों के लिए न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया। हालांकि प्रकाश को सोमवार को भी अदालत में पेश किया जाएगा। दरअसल सोमवार को उमा खुराना की जमानत पर सुनवाई होनी है। इस दौरान आवाज के सैंपल के लिए पुलिस उमा के साथ प्रकाश को भी रिमांड पर लेना चाहती है। इसकी अर्जी पुलिस ने अदालत में लगाई थी जिसे अदालत ने स्वीकार कर लिया।
अपराध शाखा के उपायुक्त मधुप तिवारी के अनुसार इस प्रकरण में चैनल का पक्ष जानने के लिए सीआरपीसी की धारा-160 के तहत चैनल प्रबंधन को नोटिस देकर वहां से किसी प्रतिनिधि को शुक्रवार को बुलाया गया था, लेकिन शुक्रवार को चैनल प्रबंधन की ओर से कोई नहीं आया। लेकिन मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए शनिवार को चैनल के सीईओ सुधीर चौधरी अपराध शाखा के आरकेपुरम कार्यालय पहुंचे। वहां शाखा के उच्च अधिकारियों ने उनसे लंबी पूछताछ की। पुलिस ने उनका पूरा बयान दर्ज किया है। श्री चौधरी ने बताया कि उन्होंने स्टिंग को एक खबर की तरह दिखाया था। रिपोर्टर ने स्टिंग के बारे में जो जानकारियां दी थीं, उसी के अनुसार खबर चैनल पर प्रसारित की गई थी। उन्होंने इस बात से इनकार किया कि उन्हें या चैनल प्रबंधन को रिपोर्टर की मंशा या षड्यंत्र की जानकारी थी।
उनका कहना था कि रिपोर्टर प्रकाश सिंह, उसकी महिला पत्रकार मित्र और वीरेंद्र अरोड़ा के बारे में बाद में जानकारी मिली। पुलिस सूत्रों की मानें तो अब यह स्पष्ट हो गया है कि इस पूरे षड्यंत्र के पीछे प्रकाश सिंह और वीरेंद्र अरोड़ा का ही हाथ है।
ज्ञात हो कि गत 30 अगस्त को एक न्यूज चैनल में उमा खुराना नामक शिक्षिका को रुपये लेकर स्कूली छात्रा के जिस्म का सौदा करते दिखाया गया था। उमा खुराना आसफ अली रोड स्थित सरकारी स्कूल में शिक्षिका थी। टीवी पर इस खबर को देखते ही तुर्कमान गेट इलाके के लोगों ने स्कूल में घुसकर उग्र प्रदर्शन किया। उन्होंने पुलिस जिप्सी फूंकने के साथ दर्जनों गाड़ियों को क्षतिग्रस्त कर दिया। गिरफ्तारी के दौरान भी लोगों ने उमा से मारपीट की और उसके कपड़े फाड़ दिए थे।
लेकिन बाद में इस स्टिंग की सच्चाई के बारे में अलग ही कहानी सामने आई। पुलिस के अनुसार उमा खुराना का स्टिंग ऑपरेशन करने वाले रिपोर्टर प्रकाश सिंह ने अपनी मित्र तथा पेशे से पत्रकार युवती के साथ मिलकर इस पूरे मामले को धोखे से गलत तथ्यों के साथ शूट किया। इस काम में वीरेंद्र अरोड़ा ने इनकी मदद की। क्योंकि उमा ने वीरेंद्र से किसी बिजनेस के सिलसिले में कर्ज ले रखा था जिसे अभी वह लौटाने की स्थिति में नहीं थी। मामले के काफी पेचीदा हो जाने के बाद इसकी जांच की जिम्मेदारी मध्य जिला पुलिस से लेकर अपराध शाखा को सौंपी गई। पुलिस ने उमा की गिरफ्तारी के बाद उसके साथी वीरेंद्र अरोड़ा को गिरफ्तार किया। फिर पुलिस ने स्टिंग में स्कूली छात्रा बनी नोएडा की युवती को गिरफ्तार कर लिया। इसके बाद शुक्रवार को पुलिस ने रिपोर्टर प्रकाश सिंह को भी गिरफ्तार कर लिया।

अब खबर से जुडे कुछ सवाल
इन सारे तथ्‍यों से एक बात स्‍पष्‍ट हो जाता है कि चैनल किसी भी प्रकार से रिपोर्टर की जिम्‍मेवारी नहीं लेना चाहता है। यह कैसा न्‍याय है ? क्‍या चैनल के संचालक यह कहना चाहते हैं कि उनके यहां काम करने वाले रिपोर्टर अपनी जिम्‍मेवारी पर कोई रिपोर्ट पेश करते हैं ? चैनल का उस रिपोर्ट से कुछ लेना देना नहीं होता ? लेकिन जब रिपोर्ट पेश की जार रही थी उस समय चैनल हेड अपनी पीठ थपथपाने से नहीं चुक रहे थे। फिर अभी अपने आप को अलग क्‍यों कर रहे हैं ? सरकार इन सारे प्रकरणों पर गौर करें और यह निधार्रित करें कि इस मामले में दोहरी नीति नहीं अपनाया जाए। अगर अ‍‍भिव्‍यक्ति की स्‍वतंत्रता की आड़ में किसी की व्‍यक्तिगत स्‍वतंत्रता का हनन होता है तो यह ठीक नहीं है।

शनिवार, सितंबर 08, 2007

स्टिंग ऑपरेशन का सच

स्कूली लड़कियों को जिस्मफरोशी के धंधे में धकेलने की बात स्टिंग ऑपरेशन में दिखाने पर दिल्ली सरकार ने उमा खुराना को बर्खास्त कर दिया। चैनल ने भी वाहवाही बटोरी लेकिन अब सच सामने आने लगा है। अब इस मामले में कुछ ऐसा नहीं बचा है जिसके आधार पर कहा जाए की स्टिंग में सच्‍चाई हो सकती है। स्टिंग करने वाले पत्रकार जेल में है। इस सब में शामिल लड़की भी जेल में है। बताया जा रहा है कि पहले भी कई मामले में उस लड़की का नाम उछलते रहा है। निर्भिक नाम से वह एक पत्रिका भी निकालती थी जिसमें नोएडा के दो बिल्‍डरों का पैसा लगा था।

स्टिंग की सच्‍चाई सामने आने के बाद कई सवाल उठ खड़े हुए हैं। पहला सवाल यह कि क्‍या इस प्रकार के स्टिंग ऑपरेशन से पत्रकारिता जगत में स्टिंग की विश्‍वसनीयता कितनी रह जाएगी ? दूसरा सवाल इस मामले में अगर कोई निर्दोष फंसता है तो सरकार और उस चैनल की क्‍या जिम्‍मेवारी बनती है ? तीसरा सवाल जो सबसे अहम है कि क्‍या इस प्रकार के स्टिंग ऑपरेशन को बढावा दिया जाना चाहिए ?