मंगलवार, अगस्त 31, 2010

क्‍या कॉमनवेल्‍थ पाकिस्‍तान में हो रहा है?

कॉमनवेल्‍थ गेम भारत में नहीं हो रहा है. मुझे तो कम से कम यही लग रहा है. चाहे सत्ता पक्ष के मणिशंकर अय्यर हों या विपक्ष में बैठे वामदल हों, सब कॉमनवेल्‍थ को लेकर कुछ न कुछ ऐसा बयान दे रहे हैं. इन नेताओं के बयान से ऐसा लग रहा है जैसे यह खेल पाकिस्‍तान में कराए जा रहे हैं जिसे हर हाल में असफल हो जाना चाहिए.

हालिया बयान गुजरात के मुख्‍यमंत्री नरेंद्र भाई मोदी का आया है. मोदी का कहना है कि अगर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भी खुद से पोंछा लगाने लगे तो भी कॉमनवेल्‍थ गेम का कुछ नहीं हो सकता है. मोदी का कहना है कि कॉमनवेल्‍थ मामले में काम इतना बिगड़ चुका है कि कोई कुछ नहीं कर सकता है.

क्‍या देश की सभी पार्टियां कॉमनवेल्‍थ मुद्दे पर एक होकर इसे सफल बनाने के लिए काम नहीं कर सकती? क्‍या यह गेम पाकिस्‍तान में हो रहा है? बेहतर तो यह होता कि सभी नेता, पक्ष और विपक्ष मिलकर इस गेम को सफल बनाते और फिर इस दौरान हुई खामियों के लिए जिम्‍मेदारी तय करते. आखिर यह गेम अब देश की प्रतिष्‍ठा का विषय बन चुका है.

बुधवार, अगस्त 11, 2010

युवा पूछेंगे कत्‍ल होते सपनों के प्रदेश से...

सपने
हर किसी को नहीं आते
बेजान बारूद के कणों में
सोई आग को सपने नहीं आते
बदी के लिए उठी हुई
हथेली के पसीने को सपने नहीं आते
शेल्‍फों में पड़े
इतिहास-ग्रन्‍थों को सपने नहीं आते
सपनों के लिए लाजिमी है
झेलनेवाले दिलों का होना
सपनों के लिए
नींद की नजर होना लाजिमी है
सपने इसलिए
हर किसी को नहीं आते
-पाश

पाश की यह कविता उन लोगों के लिए पढ़ना बेहतर हो सकता है जो कश्‍मीर में बारूद की फसल बो रहे हैं और युवाओं को गुमराह कर रहे हैं. जिन आंखों में भविष्‍य के सपने होने चाहिए उन आंखों में खौफ का बसेरा बना हुआ है. राज्‍य के मुखिया अपने आप को नकारा साबित करने में लगे हुए हैं और विपक्षी दल पड़ोसी मुल्‍क की ओर उम्‍मीद की किरण तलाश रहे हैं. देश के मुखिया दो शब्‍द सद्भावना के बोल कर यह उम्‍मीद करने लगे हैं कि अब मामला सुलझ जाएगा.

सरकार की भूमिका पर सवाल उठाने वाले तो तमाम हैं लेकिन कोई उनसे क्‍यों नहीं पूछ रहा है जो गैर राजनीतिक बुद्धिजीवी हैं? ये लोग क्‍या कर रहे हैं? अगर इस उम्‍मीद में कश्‍मीर के बुद्धिजीवी अपने आप को राहत महसूस कर रहे होंगे कि हमारी तो कोई जवाबदेही नहीं है तो वे भूल जाएं इस बात को. आने वाले समय में प्रदेश का आम आदमी, युवा उन गैर राजनीतिक बुद्धिजीवियों की दिनचर्या, उनके पहनावे या उन नपुंसक मुठभेड़ के बारे में या फिर उनकी विद्वता के विषय में जानना नहीं चाहेगा और ना ही सफेद झूठ के साए में जन्‍मे उनके उलजूलूल जवाबों को सुनना पसंद करेगा.

कल घाटी का युवा उनसे भी सवाल पूछेगा. वह पूछेगा उनसे कि तब उन्‍होंने क्‍या किया जब मीठी आग की तरह उनका प्रदेश दम तोड़ रहा था? प्रदेश के युवा जिनका उन गैर राजनीतिक बुद्धिजीवियों की बातों में या विचारों में कोई स्‍थान नहीं है, वे पूछेंगे तब आपने क्‍या किया जब हमारे सपनों का कत्‍ल किया जा रहा था? सरकार की तरह प्रदेश के वे तमाम बुद्धिजीवी भी अपराधी हैं जो इस समय घाटी में युवओं के सपनों को जलते हुए देखकर भी खामोश बैठें हैं. मसला कुछ भी हो शांति और अमन से निपटाया जा सकता है और इसकी पहल हरेक स्‍तर पर हरहाल में होनी चाहिए.

गुरुवार, फ़रवरी 11, 2010

सबकी है मुंबई

मुंबई किसकी यह सवाल पूछना बेमानी है। इसका यह मतलब निकाला जा सकता है कि इस पर शक है. लेकिन हमें इसपर कोई शक नहीं होना चाहिए कि मुंबई सबकी है, देश की है, देशवासियों की है. ठाकरे परिवार या किसी राजनीतिक पार्टी की जागीर नहीं है.