बुधवार, दिसंबर 07, 2011

पहले मंत्री को दुरूस्‍त करें सोशल मीडिया को नहीं...

भारत में करीब पौने 4 करोड़ लोग फेसबुक पर और करीब पौने 2 करोड़ लोग ट्वीटर पर सक्रिय है. देश-विदेश के तमाम मुद्दों पर यहां बातें होती हैं जिनमें से कुछ बातें निश्चित तौर पर ऐसी होती हैं जिन्‍हें मयार्दित नहीं कहा जा सकता. नेताओं की ऐसी तस्‍वीरें और ऐसे लतीफों की भरमार है जिसे किसी अखबार में या चैनल पर नहीं दिखाया जा सकता लेकिन यह भी सच है कि इसी फेसबुक और ट्वीटर ने अन्‍ना की आंदोलन को आग की तरह फैलाने में सक्रिय भूमिका निभाई और सरकार को झकझोर कर रख दिया. अब सरकार चाहती है कि सो‍शल मीडिया पर कंटेंट की निगरानी हो. ऐसे में सवाल उठता है कि क्‍या सोशल मीडिया पर निगरानी के बहाने सरकार सेंसरशिप लाना चाहती हैं?

पिछले एक महीने से यह कवायद जारी है. केंद्रीय मंत्री कपिल सिब्‍बल इस मुहिम में लगे हुए हैं. इसी सिलसिले में कपिल सिब्‍बल ने गूगल, फेसबुक और माइक्रोसॉफ्ट के वरिष्‍ठ अधिकारियों से मुलाकात कर उनसे यह कहा कि वह अपने सोशल साइटो से सभी आपत्तिजनक कंटेंट (जो राहुल गांधी, सोनिया गांधी और कांग्रेस से संबंधित है)हटाए. हालांकि गूगल ने ऐसा करने से मना कर दिया लेकिन फेसबुक की ओर से यह बयान आया कि आपतिजनक कंटेट हटाने की सुविधा साइट पर दी गई है फिर भी वह इस मामले पर ध्‍यान देगा.

सवाल यह भी है कि सरकार ऐसा क्‍यों कर रही है? क्‍या राहुल गांधी और सोनिया गांधी पर आपत्तिजनक कंटेंट ही आपत्तिजनक माने जाएंगे या किसी और के मामले में भी ऐसा होगा? क्‍या सरकार की नियत इस मामले में साफ है? क्‍या अन्‍ना के आंदोलन के दौरान सोशल मीडिया का उपयोग जिस तरीके से हुआ उससे सरकार डर गई है? क्‍या अन्‍ना के आंदोलन फिर से शुरू होने के मद्देनजर सरकार इस टूल को भोथरा करने की कोशिश कर रही है? क्‍या इसी बहाने सरकार मीडिया (सोशल) पर सेंसरशिप लाना चाहती है?

ढ़ेरों सवाल है और उसके ढ़ेरों जवाब हो सकते हैं. सरकार क्‍यों नहीं आईटीएक्‍ट के तहत कार्रवाई कर रही है? सरकार क्‍यों नहीं अपने पास मॉनिटरिंग की सुविधा बढ़ाना चाहती है? सरकार फेसबुक और ट्वीटर पर क्‍यों नहीं जनता की आवाजों को सुनना चाहती है? ऐसे तमाम उपाए है जिस पर सरकार को अमल करना चाहिए.

इंटरनेट यूज करने वाले भारत में तकरीबन 10 करोड़ हैं. मोबाइल यूजर की संख्‍या 85 करोड़ पहुंच चुकी है. फेसबुक और ट्वीटर बहुत ही निजी पहुंच का मीडियम है. मोबाइल पर जिस तरीके से इसका उपयोग बढ़ रहा है आने वाले समय में यह काफी हदतक जनमत बनाने में सहायक होने वाला है. ऐसा भी हो सकता है कि यही सोशल मीडिया यह तय करे कि देश में किसकी सरकार बनें. सफर भले ही लंबा है लेकिन ऐसा होना है और होकर रहेगा.

सरकार निगरानी की ओट में सोशल मीडिया पर सेंसर लगाना चाह रही है. पता नहीं सरकार यह क्‍यों सोच रही है कि जैसा वह सोच रही है सारा देश भी वैसा ही सोचें? हमें तो लगता है इस तरीके की बचकानी हरकतों से सरकार को अलग रहना चाहिए. यह उनकी कैबिनेट नहीं है. वैसे कैबिनेट की मंत्री भी उनकी कहां सुनते हैं. पहले उनको दुरूस्‍त करें सोशल मीडिया को नहीं.

शुक्रवार, नवंबर 04, 2011

'क्‍या यह मध्‍यरात्रि का नरसंहार है....'

पेट्रोल की कीमत मध्‍यरात्रि से लागू हो जाती है. अगले एक दो दिन विरोध प्रदर्शन होता है. सरकार की तरफ से बयान जारी किया जाता है. विपक्ष विरोध जताते हैं लेकिन कुछ होता नहीं है और कीमत जारी रहती है. पेट्रोलियम कं‍पनियों को नुकसान न हो यह बड़ा मसला है... जनता का क्‍या है चुनाव से पहले मना लेंगे.

ऐसा लग रहा है जैसे सरकार लोक कल्‍याणकारी संस्‍था के रूप में नहीं, एक प्राइवेट लिमिटेड कंपनी के रूप में काम रही है जहां लागत मूल्‍य के आधार पर वस्‍तुओं की कीमत तय की जाती है. वरना महंगाई से निपटना एक सरकार के लिए इतना मुश्किल हो जाएगा, यह हास्‍यास्‍पद लग रहा है.

सरकार में अर्थशास्त्रियों की नहीं एक सोच की कमी है. शरद पवार के बयान चीनी की कीमत को बढ़ाने के लिए काफी होता था. गोदामों में सड़ते अनाज को गरीबों में मुफ्त बांटने की सुप्रीम कोर्ट के आदेश को कृषि मंत्री शरद पवार ने नकार दिया था. पवार का कहना था कि मुफ्त गेहूं बांटना मुमकिन नहीं है.

जब से यूपीए सरकार में आई पेट्रोलियम पदार्थों की कीमतों में पंख लग गए. इसका असर खाद्य पदार्थों समेत कई अन्‍य रूप में देखने को मिला. महंगाई दर आसमान छूने लगी. फल, सब्जियों के दाम आम आदमी की पहुंच से देखते देखते निकल गए. सरकार आश्‍वासन दे दे कर कई दिसम्‍बर निकाल चुकी है. बैंक का रेपो रेट घर और गाड़ी की किस्‍त पर भारी पड़ने लगा है. महंगाई की किस्‍त जब पेट्रोल बम के रूप में सामने आता है तो सरकार आश्‍वासन देती है, दिसम्‍बर में सब ठीक हो जाएगा. लेकिन वह दिसम्‍बर किस वर्ष का होगा पता नहीं चलता.

पेट्रोल की कीमतों में वृद्धि पर ममता बनर्जी ने काफी कठोर संदेश देने की कोशिश की है. बीजेपी ने भी कड़ा ऐतराज जताकर अपनी विपक्षी पार्टी होने का सबूत दे दिया है. लेकिन सबसे शानदार टिप्‍पणी थी यशवंत सिन्‍हा की, 'ये मध्‍यरात्रि का नरसंहार है.' इन टिप्‍पणियों का क्‍या... हमलोग कोई लोक कल्‍याणकारी राज्‍य में तो रहते नहीं हैं... अब तो बस एक ही उपाए है अगले तीन वर्षों के लिए... हमें इस देश को चलाने वाली प्राइवेट लिमिटेड कंपनी पर भरोसा करना चाहिए.

गुरुवार, सितंबर 08, 2011

पहले मुंबई अब दिल्‍ली, आखिर कब तक?

एक और बम धमाका, एक और शोक संदेश, एक और मुआवजे की घोषणा... बस यही दस्‍तूर बन गया है. जनता के जिम्‍मे जान देने का काम और नेताओं के जिम्‍मे बयान देने का. और कितने जान देने के बाद इस बात की गारंटी हमारी सरकार हमें देगी कि अब ऐसी घटना को हम नहीं होने देंगे? ऐसे कितने सिपाहियों को जान देने के बाद हमारी सरकार को इस बात का इल्‍म होगा कि दोषी को सजा दे देनी चाहिए? नेताओं की रस्‍म अदायगी आखिर कब तक? जान देने का सिलसिला आखिर कब तक? पहले मुंबई और अब दिल्‍ली, आखिर कब तक?

देश के युवराज की संज्ञा से नवाजे गए माननीय राहुल गांधी का कुछ दिन पहले यह बयान आया था जिसमें यह कहा गया था कि हम सभी आतंकी हमलों को नहीं रोक सकते. सरकार कहती है हम महंगाई और भ्रष्‍टाचार नहीं रोक सकते. सरकार के मंत्री जब बयान देते हैं तो उनके बयानों में ठोस बात कम वादा ज्‍यादा होता है. अगर यह सरकार कुछ कर नहीं सकती तो क्‍यों बनी हुई है? क्‍या घोटाला को छोड़कर और कुछ करने में यह सरकार सक्षम नहीं है?

जनता टैक्‍स देती है क्‍या नेताओं को लूट कर अपना घर बनाने के लिए? जनता टैक्‍स देती है क्‍या कोरी बातें सुनने के लिए? जनता टैक्‍स देती है क्‍या अपने जान से हाथ धोने के लिए? जनता टैक्‍स देती है क्‍या मरने के बाद आश्रितों को मुआवजा देने के लिए?

संसद की सर्वोच्‍चता पर कोई सवाल नहीं उठा सकता... ऐसा कहना है हमारे सांसदों का. तो क्‍या महंगाई और भ्रष्‍टाचार से त्रस्‍त जनता, आतंकवाद से पीडि़त जनता इन सांसदों की पूजा करें या उस चौखट की पूजा करें और आशा भरी नजरों से अपने ही द्वारा चुने गए उन सांसदों की ओर देखें जो आतंकवादियों को फांसी की सजा से बचाने की वकालत कर रहे हैं? क्‍या वैसे सांसदों से न्‍याय और सुरक्षा की उम्‍मीद करें जो वोट की राजनीति के कारण ठोस निर्णय लेने में अक्षम है?

ऐसा लगने लगा है जैसे चुने हुए सांसद भारत के भाग्‍य विधाता बन गए हैं इसमें जनता कहीं नहीं है, इसलिए उनकी सुरक्षा की जिम्‍मेदारी किसी की नहीं है.

गुरुवार, अगस्त 11, 2011

(जन)लोकपाल और आरक्षण के बीच 'समझदारों का गीत'

देश में (जन)लोकपाल पर बहस छिड़ी हुई है. बॉलीवुड में प्रकाश झा अपनी फिल्‍म आरक्षण को लेकर चर्चा में हैं तो महंगाई और भ्रष्‍टाचार के बीच जनता की स्थिति दयनीय बनी हुई है. ढ़ेर सारे मुद्दे और ढ़ेर सारे सवाल सरकार और जनता दोनों के पास है.

खैर सबकी अपनी समस्‍या और अपना दर्द है. ऐसे में आज काफी समय बाद फिर से गोरख पांडे जी की कुछ कविताओं को पढ़ने का मौका मिला. उनमें से एक कविता को यहां दे रहा हूं, आप भी पढ़ें:

समझदारों का गीत

हवा का रुख कैसा है,हम समझते हैं
हम उसे पीठ क्यों दे देते हैं,हम समझते हैं
हम समझते हैं ख़ून का मतलब
पैसे की कीमत हम समझते हैं
क्या है पक्ष में विपक्ष में क्या है,हम समझते हैं
हम इतना समझते हैं
कि समझने से डरते हैं और चुप रहते हैं।

चुप्पी का मतलब भी हम समझते हैं
बोलते हैं तो सोच-समझकर बोलते हैं हम
हम बोलने की आजादी का
मतलब समझते हैं
टुटपुंजिया नौकरी के लिये
आज़ादी बेचने का मतलब हम समझते हैं
मगर हम क्या कर सकते हैं
अगर बेरोज़गारी अन्याय से
तेज़ दर से बढ़ रही है
हम आज़ादी और बेरोज़गारी दोनों के
ख़तरे समझते हैं
हम ख़तरों से बाल-बाल बच जाते हैं
हम समझते हैं
हम क्योंबच जाते हैं,यह भी हम समझते हैं।

हम ईश्वर से दुखी रहते हैं अगर वह
सिर्फ़ कल्पना नहीं है
हम सरकार से दुखी रहते हैं
कि समझती क्यों नहीं
हम जनता से दुखी रहते हैं
कि भेड़ियाधसान होती है।

हम सारी दुनिया के दुख से दुखी रहते हैं
हम समझते हैं
मगर हम कितना दुखी रहते हैं यह भी
हम समझते हैं
यहां विरोध ही बाजिब क़दम है
हम समझते हैं
हम क़दम-क़दम पर समझौते करते हैं
हम समझते हैं
हम समझौते के लिये तर्क गढ़ते हैं
हर तर्क गोल-मटोल भाषा में
पेश करते हैं,हम समझते हैं
हम इस गोल-मटोल भाषा का तर्क भी
समझते हैं।

वैसे हम अपने को किसी से कम
नहीं समझते हैं
हर स्याह को सफे़द और
सफ़ेद को स्याह कर सकते हैं
हम चाय की प्यालियों में
तूफ़ान खड़ा कर सकते हैं
करने को तो हम क्रांति भी कर सकते हैं
अगर सरकार कमज़ोर हो
और जनता समझदार
लेकिन हम समझते हैं
कि हम कुछ नहीं कर सकते हैं
हम क्यों कुछ नहीं कर सकते हैं
यह भी हम समझते हैं।

-गोरख पांडे

रविवार, अगस्त 07, 2011

ईमान बेचते चलो, तुम भी महलों में रह लोगे...

देश के दोनों बड़े दल भ्रष्‍टाचार के सागर में गोते लगा रहे हैं. एक दल को इस बात का गुमान है कि उसे जनता ने सत्ता दिया है शासन करने के लिए. अब जनता को यह हक नहीं बनता है कि वह कुछ कहे. जो जनता कुछ कहना चाहती है उसके लिए नसीहत यह है कि वह पहले जनता के बीच से चुन कर आए. सिर्फ जनता होने से काम नहीं चलेगा. जनता को कुछ भी पूछने या जानने का हक नहीं है. जनता एक बार अपने प्रतिनिधि को निर्वाचित कर दी तो अगले पांच वर्षों तक के लिए वह अपने मुंह पर ताला जड़ ले. अब वह सिर्फ सह सकती है लेकिन न तो सवाल कर सकती है और ना ही आवाज.

दूसरी पार्टी जो विपक्ष में बैठी है उसको इस बात का गुमान है कि सवाल पूछने का हक सिर्फ मेरे पास है. लेकिन मैं अपनी मर्जी से ही कुछ करुंगा. मैं जनता के प्रति जबावदेह नहीं हूं. वैसे जनता मेरा क्‍या कर लेगी... अगर मैं भ्रष्‍टाचार के मामले में सत्ता पक्ष का साथ देता हूं तो मुझे भी लाभ मिलेगा.

मेरे विचार से कुछ ऐसा ही खेल खेला जा रहा है संसद में. कांग्रेस कर्नाटक पर चुप रहेगी तो बीजेपी दिल्‍ली के मसले पर कुछ नहीं बोलेगी. महंगाई से निपटना किसी के लिए आसान काम नहीं है तो दोनों पार्टी इसपर चुप रहेंगे और संसद में भी दोस्‍ताना बहस करेंगे... भले ही इसका फायदा कालाबाजारी करने वाले ले जाएं. मंत्री एक और बयान देंगे और अगले दो महीने तक महंगाई के नाम पर लूटने की पूरी आजादी मिल जाएगी क्‍योंकि सरकार जब खुद ही कहेगी कि महंगाई अगले दो महीनें कम नहीं होगी तो चाहे जिस किमत में सामान बेचो कोई क्‍या कर लेगा.

मीडिया भी अपनी भूमिका को शायद ही ठीक से निभा पा रही है. सांसद तो मीडिया वालों से भी यह कहने से नहीं चुक रहे हैं कि आप अपने काम से काम रखें. वे तो यहां तक नसीहत देने लगे हैं कि आपका काम है मेरे संदेश को जनता तक पहुंचाने का तो सिर्फ वही करें और सवाल पूछना बंद करें. वैसे सांसद महोदय की बातों का कुछ असर होता भी है और कुछ पत्रकार अपना सवाल पूछना भूल जाते हैं. शायद उन्‍हें इस बात का डर हो जाता होगा कि अगर संबंध खराब हो गए तो अगली बार खबर कैसे मिलेगी.

ऐसे मौके पर महान कवि गोपाल सिंह नेपाली की एक कविता याद आ रही है जो कभी अपने हॉस्‍टल के दिनों में मैंने पढ़ा था... हालांकि यह कविता 1962 के युद्ध के दौरान लिखी गई थी लेकिन इसकी प्रासंगिकता आज भी है.

मेरा धन है स्वाधीन कलम

राजा बैठे सिंहासन पर, यह ताजों पर आसीन कलम
मेरा धन है स्वाधीन कलम
जिसने तलवार शिवा को दी
रोशनी उधार दिवा को दी
पतवार थमा दी लहरों को
खंजर की धार हवा को दी
अग-जग के उसी विधाता ने, कर दी मेरे आधीन कलम
मेरा धन है स्वाधीन कलम

रस-गंगा लहरा देती है
मस्ती-ध्वज फहरा देती है
चालीस करोड़ों की भोली
किस्मत पर पहरा देती है
संग्राम-क्रांति का बिगुल यही है, यही प्यार की बीन कलम
मेरा धन है स्वाधीन कलम

कोई जनता को क्या लूटे
कोई दुखियों पर क्या टूटे
कोई भी लाख प्रचार करे
सच्चा बनकर झूठे-झूठे
अनमोल सत्य का रत्‍नहार, लाती चोरों से छीन कलम
मेरा धन है स्वाधीन कलम

बस मेरे पास हृदय-भर है
यह भी जग को न्योछावर है
लिखता हूँ तो मेरे आगे
सारा ब्रह्मांड विषय-भर है
रँगती चलती संसार-पटी, यह सपनों की रंगीन कलम
मेरा धन है स्वाधीन कलम

लिखता हूँ अपनी मर्ज़ी से
बचता हूँ कैंची-दर्ज़ी से
आदत न रही कुछ लिखने की
निंदा-वंदन खुदगर्ज़ी से
कोई छेड़े तो तन जाती, बन जाती है संगीन कलम
मेरा धन है स्वाधीन कलम

तुझ-सा लहरों में बह लेता
तो मैं भी सत्ता गह लेता
ईमान बेचता चलता तो
मैं भी महलों में रह लेता
हर दिल पर झुकती चली मगर, आँसू वाली नमकीन कलम
मेरा धन है स्वाधीन कलम

गुरुवार, जुलाई 14, 2011

मेरा देश भगवान भरोसे और आपका...

राहुल गांधी ने कहा है कि हम हर हमले को नहीं रोक सकते हैं. उधर गृहमंत्री पी चिदम्‍बरम ने कहा है कि इस हमले से संबंधित कोई खुफिया जानकारी नहीं भेजी गई थी और ना ही किसी एजेंसी के पास इससे संबंधित कोई जानकारी उपलब्‍ध थी. कोयला मंत्री श्रीप्रकाश जयसवाल ने कहा कि 26/11 के बाद 31 महीनों तक मुंबई में कोई आतंकी घटना नहीं घटी है यह सरकार की उपलब्धि है.

इन बयानों पर सबकी अपनी राय हो सकती है. देश के तीन कद्दावर नेता जो राय जाहिर कर रहे हैं उससे देश की जनता मेरे समझ से गर्व महसूस नहीं करेगी. क्‍या राहुल अपने बयान से यह जाहिर करना चाहते हैं कि देश के सुरक्षा की जिम्‍मेदारी मेरी नहीं है, ऐसे हमले होते रहेंगे और हम इसका कुछ नहीं कर सकते?

महाराष्‍ट्र में कांग्रेस और केंद्र में भी कांग्रेस की सरकार है तो क्‍या पी चिदम्‍बरम अपने बयान से यह साबित करने की कोशिश कर रहे हैं कि महाराष्‍ट्र सरकार की कहीं कोई खामी नहीं है और ना ही केंद्र सरकार की कोई कमी है?

...और श्रीप्रकाश जी यह साबित करने की कोशिश कर रहे हैं कि मुंबई में 31 महीनों तक कोई आतंकी हमला नहीं हुआ तो यह उनकी या उनके सरकार की उपलब्धि है?

अगर सरकार हमें सुरक्षा नहीं दे सकती, देश में भ्रष्‍टाचार नहीं रोक सकती, महंगाई से निजात नहीं दिला सकती तो फिर क्‍या कर सकती है? क्‍या वह सिर्फ निर्दोषों पर लाठीचार्य (जैसा कि बाबा रामदेव एवं उनके समर्थकों पर रामलीला मैदान में हुआ) करने के लिए बैठी है या फिर महंगाई बढ़ाने की पेट्रोल डीजल की बढ़ी कीमतों की सूचना देने के लिए बैठी है?

मेरे विचार से अपने देश में सुरक्षा व्‍यवस्‍था सहित तमाम व्‍यवस्‍थाएं भगवान भरोसे चल रही है. आपका क्‍या मानना है?

गुरुवार, मई 12, 2011

क्‍या सरकार दलाल की भूमिका निभा रही है?

उत्तर प्रदेश के ग्रेटर नोएडा में जमीन अधिग्रहण का खेल जारी है. कभी एक्‍सप्रेस वे के नाम पर तो कभी सुव्‍यवस्थित शहर बनाए जाने के नाम पर. मजे की बात तो यह कि अधिग्रहित जमीन को सरकार करीब 10 गुणा ज्‍यादा दर पर बिल्‍डरों को बेच रही है.

इससे पहले यूपी की सपा सरकार ने स्‍पेशल इकोनॉमी जोन के नाम पर कई बड़े उद्योगपतियों को जमींदार बना चुकी है. जिस काम के लिए जमीन लिया गया था अभी तक तो वह काम नहीं हो पाया... लेकिन लगता है बसपा सरकार की सोच इस मसले पर सपा से अलग है. सरकार जमीन एक्‍सप्रेस वे (यमुना, गंगा जैसे एक्‍सप्रेस वे) के नाम पर ले रही है. जाहिर सी बात है सड़क के दोनों ओर विकास के काम होंगे और यह काम कोई न कोई कंस्‍ट्रक्‍शन कंपनी ही करेगी.

खैर यह तो सरकार की परेशानी है. फिलहाल किसानों की परेशानी उसे मिलने वाली रकम को लेकर है. प्रशासन अपने कानून को लेकर और किसान अपनी जमीन को लेकर अड़े हुए हैं. इसी बीच नेताओं को अपनी जमीन दिखने लगी है. कई नेताओं को वहां की जमीन पर खेती करने का मौका भी मिल गया है. फसल 2012 में कटेगी जब राज्‍य में विधानसभा चुनाव होंगे. इसके लिए लगभग सभी राष्‍ट्रीय या स्‍थानीय दल जी जान से जुट गए हैं. आप इसे कह सकते हैं कि सभी लोग विकास के काम में लग गए हैं.

इस विकास की दौर में क्‍या कुछ और बेहतर नहीं हो सकता, मसलन सरकार विकास के नाम पर दलाल की भूमिका निभाना छोड़कर जमीन किसानों की सहमति से ले और उसे उसी दर पर भुगतान करवाए जिस दर पर वह बिल्‍डरों को दे रही है? पता नहीं यह कितना व्‍यवहारिक होगा लेकिन मेरे विचार से कुछ ऐसा जरुर होना चाहिए.

बुधवार, अप्रैल 27, 2011

गुस्‍से का प्रतीक चप्‍पल या...

क्‍या गुस्‍से के प्रदर्शन के लिए चप्‍पल या जूता उछाला जाना जायज है? हो सकता है काफी लोग इसके पक्ष में हों लेकिन यह तरीका ठीक नहीं लगता. जूते का हालिया शिकार बने हैं कॉमनवेल्‍थ गेम्‍स के सर्वेसर्वा सुरेश कलमाडी. हालांकि कलमाडी ने भी अपने राजनीतिक करियर की शुरूआत चप्‍पल उछालकर ही की थी.

गुस्‍सा कब चप्‍पल के रुप में तब्‍दील हो जाए कहना मुश्किल होता है. जॉर्ज डब्‍ल्‍यू बुश पर उछला जूता ऐसा उछला कि कई देशों में इसे देखा गया. कई ऑनलाइन गेम बने. यह गेम इतना पॉपुलर हुआ कि लोग अपना फ्रस्‍टेशन निकालने के लिए इसका उपयोग करने लगे.

जॉर्ज डब्‍ल्‍यू बुश पर उछला जूता नीचे गिरा ही था कि अपने देश में भी जूता उछलना शुरू हो गया. पत्रकार जरनैल सिंह के गुस्‍से का शिकार बने तत्‍कालीन गृहमंत्री पी. चिदम्‍बरम. एक बड़े अखबार के इस पत्रकार को अपनी नौकरी से हाथ धोनी पड़ी. आडवाणी पर भी चप्‍पल उछले और ...फिर तो सिलसिला ही शुरु हो गया. कई और छोटे बड़े नेता इसका शिकार बने.

वैसे जनरल मुशर्रफ से लेकर चीन के राष्‍ट्रपति तक इसका शिकार बन चुके हैं. भारत में इसकी शुरूआत कब से हुई कहना थोड़ा मुश्किल होगा. जितनी जानकारी मिल पा रही है उसके अनुसार सुरेश कलमाडी इसके प्रणेता हो सकते हैं. कलमाडी जब 32 वर्ष के थें तो उन्‍होंने तत्‍कालीन प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई पर चप्‍पल उछाला था. चप्‍पल तो मोरारजी भाई की कार से टकराकर रुक गई लेकिन कलमाडी जी का राजनीति करियर परवान चढ़ने लगी. उस समय कई कांग्रेसी नेता ने उनकी तारीफ की थी.

कलमाडी की कोर्ट में पेशी के दौरान जूता उछला और बड़ी खबर बन गई. हो सकता है उनको अपने पुराने दिन याद आ गए हों...

सोमवार, अप्रैल 18, 2011

कहीं राजनीति में उलझकर न रह जाए अन्‍ना की मुहिम...

अनशन की समाप्ति के ठीक बाद अन्‍ना ने अपना प्रेस कांफ्रेंस रखा. पहला विवाद वहीं से शुरू हो गया. ग्रामीण विकास की बात हुई और मीडिया सहित उनके कई समर्थकों को यह लगा कि अन्‍ना ने मोदी की तारीफ कर दी है. बाद में अन्‍ना इसपर सफाई देते फिरते रहे.

दूसरा विवाद उठा समिति में शांति भूषण एवं प्रशांत भूषण को शामिल किए जाने को लेकर. बाबा रामदेव की नाराजगी सबसे ज्‍यादा रही. इसपर भी अन्‍ना को सफाई देनी पड़ी. हालांकि बात संभली लेकिन विवाद मीडिया में आ ही गया.

जनलोकपाल बिल को लेकर कपिल सिब्‍बल के बयान पर भी सफाई देने का काम चलते रहा जिसमें उन्‍होंने कहा था कि इस बिल से कुछ नहीं होने वाला है (शिक्षा, चिकित्‍सा और अन्‍य समस्‍याओं के लिए लोग नेता को ही फोन करते हैं, वह समस्‍या तो इस बिल से हल नहीं होगा...). बाद में अरविन्‍द केजरीवाल और अन्‍ना हजारे को यहां तक कहना पड़ा कि अगर उनको इस बिल पर भरोसा नहीं है तो उन्‍हें समिति से इस्‍तीफा दे देना चाहिए. इसे आप तीसरा विवाद कह सकते हैं.

चौथा विवाद रहा शांति भूषण और अमर सिंह के बीच हुए तथाकथित बातचीत का टेप जारी होना. यह मसला 2006 का है जैसा कि अमर सिंह बता रहे हैं. अमर सिंह का कहना है कि उन्‍हें जबरदस्‍ती इस मामले में घसीटा जा रहा है जबकि शांति भूषण की ओर से यह कहा जा रहा है कि यह टेप ही फर्जी है. अन्‍ना हजारे को इस पर भी सफाई देना पड़ रहा है.

विवादों के बीच अन्‍ना के नरम रुख की बात भी हो रही है और मूल जन लोकपाल बिल में आए कई बदलाव की भी. समिति की पहली बैठक होने तक ये सारे विवाद और बदलाव देखने को मिल रहे हैं. अभी तो कई और बैठकें होनी है. कहीं ऐसा न हो कि लोकपाल बिल बनाए जाने तक जन लोकपाल बिल की सारी बातें बदल जाए और जो सरकार चाह रही है वही बिल लोगों के सामने आए... क्‍योंकि राजनीति और समाज सेवा का कोई सीधा संबंध हमें अभी तक नहीं दिखा. जिस काम से हमारे नेताओं का कोई फायदा न हो, वह उस काम को कभी नहीं करेंगे. आखिर नेता और समाजसेवक में यही तो अंतर होता है.

बुधवार, अप्रैल 13, 2011

जाति की राजनीति आखिर कब तक?

अभी एक नया विवाद खड़ा हो गया है शहीदों (भगत सिंह, राजगुरु एवं सुखदेव) की जाति को लेकर. कांग्रेस के मुखपत्र 'कांग्रेस संदेश' के मार्च अंक में शहीदी दिवस के नाम से छपे लेख में शहीद भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु की जाति का जिक्र करते हुए बताया गया है कि लाला लाजपत राय की मौत का बदला लेने के लिए ब्रिटिश अधिकारी सांडर्स की हत्या करने वालों में ये शामिल थे. टेलीविजन पर दिन से लेकर रात तक इसी पर चर्चा होते रही. पता नहीं लोग कहीं पहुंच पाए कि नहीं....अगर भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव होते, तो क्‍या इस पर चर्चा भी करते? मेरा तो मन कहता है नहीं, क्‍योंकि उनके विचार इन विवादों से परे थे, उनके लिए जाति और मजहब से बड़ा देश था....

कई समाजशास्त्रियों का मत है कि अंग्रेजों की गुलामी ने भारत को जितना नुकसान नहीं पहुंचाया, उससे कहीं अधिक जाति-प्रथा ने देश को कमजोर किया. मुट्ठी भर विदेशी आक्रमणकारियों ने अंग्रेजों से पहले भी भारत पर हमले किए और इस देश को लूटकर चले गए. अगर उस दौरान समाज एक होता और एक-एक पत्‍थर भी इन आक्रमणकारियों पर फेंक देता, तो शायद आक्रमणकारी उसी में दब जाते, लेकिन ऐसा नहीं हो सका.

बाद में अंग्रेजों ने इस व्‍यवस्‍था का जबरदस्‍त फायदा उठाया. शिक्षा एवं प्रशासनिक व्‍यवस्‍था में थोड़ा फेर-बदल कर गुलामी की मानसिकता को और अधिक मजबूत करने का प्रयास किया. जमीनदारी प्रथा पूरे देश में जड़ फैला चुकी थी. गुलाम बनाए जाने का धंधा बदस्‍तूर जारी था. ऐसे में लॉर्ड मैकाले की शिक्षा पद्धति ने मानसिक रूप से गुलाम बनाए जाने की तकनीक को मजबूत करना शुरू कर दिया. हालांकि इसके कारण देश के लोगों को काफी फायदा हुआ और अंग्रेजी की पढ़ाई उनके लिए एक हथियार बना. जिन लोगों पर इसका असर एक भाषा की तरह हुआ, वो लोग सफल रहे, लेकिन जिन लोगों पर इसका असर शासक वर्ग की तरह हुआ, वे मैकाले बन बैठे. उनके लिए अंग्रेजी सर्वश्रेष्‍ठ थी और अन्‍य भाषा गुलाम. अंग्रेजी साहित्‍य सर्वोच्‍च थी और अन्‍य साहित्‍य का स्‍थान उसके बाद.

जाति का नाम जन्‍म के साथ ही जुड़ जाता है. इसका निर्धारण जब कभी भी हुआ था, उसका पैमाना निश्चित रूप से आज का नहीं था. जाति को लेकर कुछ लोगों ने अपनी सीमा तय कर ली और यह भी तय कर लिया कि इसके दायरे में किसी और जाति के लोगों को नहीं आने देना है. परिणाम हुआ जो ब्राह्मण (जन्‍म से) थे, वो कभी क्षत्रिय नहीं बने और जो वैश्‍य थे, कभी ब्राह्मण नहीं बने. समाज को सही तरीके से संचालन करने का स्‍वप्‍न देखकर जिसने जाति व्‍यवस्‍था बनाई, उन्‍हें शायद इस प्रकार की बेईमानी या नियम पालन नहीं करने पर सजा का भय नहीं था. जाति के अंदर तो तमाम रक्षाकवच बन गए कि कैसे इसमें बने रहना है, लेकिन इससे ऊपर उठकर सोचने और पूरी व्‍यवस्‍था को संचालित करने की प्रणाली शायद विकसित नहीं हो पाई. इसका काफी दूरगामी परिणाम देखने को मिला.

जिस युग में शहीद-ए-आजम भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु देश के लिए काम कर रहे थे, उसी युग में आर्य समाज जैसी संस्‍थाएं भी काम कर रही थीं. राष्‍ट्रीय स्‍वयंसेवक संघ का उदय हो रहा था और देश में क्रांति की एक नई लहर चल पड़ी थी. मेरे विचार से शहीद-ए-आजम भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु एक ही दिन में अंग्रेजों के खिलाफ नहीं हुए होंगे. उन्‍होंने बचपन से अंग्रेजों के राज करने के तरीकों, उनकी मानसिक सोच, समाज में घटित होने वाली घटनाओं को करीब से देखा, तब जाकर कही वो भगत सिंह, सुखदेव या राजगुरु के रूप में लोगों के सामने आए. कर्म से उन्‍होंने साबित किया कि वो एक देशभक्‍त हैं, न कि ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्‍य या शूद्र.

जाति को लेकर राजनीति कई स्‍तरों पर हो रही है और पहले भी होती रही है. महाभारत काल में कर्ण को सिर्फ इस आधार पर गुरु द्रोणाचार्य ने शस्‍त्र शिक्षा देने से वंचित कर दिया था कि वो क्षत्रिय नहीं हैं. दुर्योधन ने भले ही अपने फायदे के लिए ही सही, लेकिन कर्ण को वह सम्‍मान दिया, जो जाति से ऊपर उठकर था. एकलव्‍य ने गुरु द्रोणाचार्य की प्रतिमा लगाकर शस्‍त्र चलाना सीखा और इसे दुर्भाग्‍य ही कहा जाएगा कि इसके लिए उसे अपना अंगूठा गंवाना पड़ा. हालांकि देखने का नजरिया यह कि एकलव्‍य ने गुरु दक्षिणा में अपना अंगूठा दे दिया था, यह किसी ने नहीं कहा कि यह गुरु की ज्‍यादती थी. एकलव्‍य की कहानी को वर्षों तक महिमामंडित किया जाता रहा और आज भी बदस्‍तूर जारी है.

हो सकता है यह सही रहा हो, लेकिन क्‍या एक गुरु का हृदय ऐसा क्रूर(?) होना चाहिए? क्‍या एकलव्‍य अगर क्षत्रिय होता, तो उसके साथ भी ऐसा ही व्‍यवहार किया जाता? या यह सब जाति के मजबूत होने (या जाति को मजबूत करने) के लिए किया जा रहा था? इसका जवाब अब भी उतना ही प्रासंगिक हो सकता है, जितना उस समय होता.

जाति और मजहब का इस्‍तेमाल राजनीतिक पार्टियां अपने फायदे के लिए करती रही हैं, भले ही इससे देश का नुकसान ही क्‍यों न हो. शहीदों (भगत सिंह, राजगुरु एवं सुखदेव) की जाति को लेकर जो विवाद पैदा करने की कोशिश हुई है, उसके पीछे पक्ष और विपक्ष की मानसिकता सही नजर नहीं आ रही है. अब देश वैसा नहीं रहा कि ये लोग धर्म और जाति के नाम पर हिंसा फैला देंगे और देश को मु‍सीबत में डाल देंगे. इसके लिए इन्‍हें कोई और तरीका ढ़ूंढना होगा. फिलहाल हमारे भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव आमरण अनशन तोड़ चुके हैं और एक नई लड़ाई की तैयारी कर रहे हैं.

क्‍या अन्‍ना की बात पर राजनीति जरुरी है?

अन्‍ना हजारे ने गुजरात और बिहार में हो रहे ग्रामीण क्षेत्रों में विकास का उल्‍लेख अपने प्रेस कांफ्रेंस में किया था. अन्‍ना यह भूल गए कि वह कहां बोल रहे हैं और लोग उसका क्‍या मतलब निकालेंगे. मेधा पाटेकर और मल्लिका साराभाई जब इसका मतलब मोदी की तारीफ से लगा सकती है तो दूसरे अन्‍य लोगों की बात ही क्‍या. लगता है लोगों ने यह मान लिया है कि एक गलती (?) की सजा तमाम अच्‍छे कामों से ज्‍यादा होनी चाहिए. जब तक मोदी उस सीमा को तय नहीं कर लेते तब तक वो प्रशंसा के पात्र नहीं होंगे!

गुरुवार, अप्रैल 07, 2011

देश की आवाज बने अन्‍ना हजारे

देश की आवाज अन्‍ना हजारे की आवाज बन गई है. अन्ना हजारे जिस जन लोकपाल बिल के लिए भूख हड़ताल पर हैं, उसे सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस संतोष हेगड़े, वक़ील प्रशांत भूषण और आरटीआई कार्यकर्ता अरविंद केजरीवाल ने मिलकर तैयार किया है.

क्‍या है जन लोकपाल बिल में:
1. इस बिल में भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच के लिए केंद्र में लोकपाल और राज्य में लोकायुक्तों की नियुक्ति का प्रस्ताव है.
2. इनके कामकाज में सरकार और अफसरों का कोई दखल नहीं होगा.
3. भ्रष्टाचार की कोई शिकायत मिलने पर लोकपाल और लोकायुक्तों को साल भर में जांच पूरी करनी होगी.
4. अगले एक साल में आरोपियों के ख़िलाफ़ केस चलाकर क़ानूनी प्रक्रिया पूरी की जाएगी और दोषियों को सज़ा मिलेगी.
5. यही नहीं भ्रष्टाचार का दोषी पाए जाने वालों से नुकसान की भरपाई भी कराई जाएगी.
6. अगर कोई भी अफसर वक्त पर काम नहीं करता जैसे राशन कार्ड या ड्राइविंग लाइसेंस नहीं बनाता तो उस पर जुर्माना लगाया जाएगा.
7. 11 सदस्यों की एक कमेटी लोकपाल और लोकायुक्त की नियुक्ति करेगी.
8. लोकपाल और लोकायुक्तों के खिलाफ आरोप लगने पर भी फौरन जांच होगी.
9. जन लोकपाल विधेयक में सीवीसी और सीबीआई के एंटी करप्शन डिपार्टमेंट को आपस में मिलाने का प्रस्ताव है.
10. साथ ही जन लोकपाल विधेयक में उन लोगों को सुरक्षा देने का प्रस्ताव है जो भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाएंगे.