बुधवार, अप्रैल 27, 2011

गुस्‍से का प्रतीक चप्‍पल या...

क्‍या गुस्‍से के प्रदर्शन के लिए चप्‍पल या जूता उछाला जाना जायज है? हो सकता है काफी लोग इसके पक्ष में हों लेकिन यह तरीका ठीक नहीं लगता. जूते का हालिया शिकार बने हैं कॉमनवेल्‍थ गेम्‍स के सर्वेसर्वा सुरेश कलमाडी. हालांकि कलमाडी ने भी अपने राजनीतिक करियर की शुरूआत चप्‍पल उछालकर ही की थी.

गुस्‍सा कब चप्‍पल के रुप में तब्‍दील हो जाए कहना मुश्किल होता है. जॉर्ज डब्‍ल्‍यू बुश पर उछला जूता ऐसा उछला कि कई देशों में इसे देखा गया. कई ऑनलाइन गेम बने. यह गेम इतना पॉपुलर हुआ कि लोग अपना फ्रस्‍टेशन निकालने के लिए इसका उपयोग करने लगे.

जॉर्ज डब्‍ल्‍यू बुश पर उछला जूता नीचे गिरा ही था कि अपने देश में भी जूता उछलना शुरू हो गया. पत्रकार जरनैल सिंह के गुस्‍से का शिकार बने तत्‍कालीन गृहमंत्री पी. चिदम्‍बरम. एक बड़े अखबार के इस पत्रकार को अपनी नौकरी से हाथ धोनी पड़ी. आडवाणी पर भी चप्‍पल उछले और ...फिर तो सिलसिला ही शुरु हो गया. कई और छोटे बड़े नेता इसका शिकार बने.

वैसे जनरल मुशर्रफ से लेकर चीन के राष्‍ट्रपति तक इसका शिकार बन चुके हैं. भारत में इसकी शुरूआत कब से हुई कहना थोड़ा मुश्किल होगा. जितनी जानकारी मिल पा रही है उसके अनुसार सुरेश कलमाडी इसके प्रणेता हो सकते हैं. कलमाडी जब 32 वर्ष के थें तो उन्‍होंने तत्‍कालीन प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई पर चप्‍पल उछाला था. चप्‍पल तो मोरारजी भाई की कार से टकराकर रुक गई लेकिन कलमाडी जी का राजनीति करियर परवान चढ़ने लगी. उस समय कई कांग्रेसी नेता ने उनकी तारीफ की थी.

कलमाडी की कोर्ट में पेशी के दौरान जूता उछला और बड़ी खबर बन गई. हो सकता है उनको अपने पुराने दिन याद आ गए हों...

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